अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हम थे, हैं, रहेंगे अजनबी... !!

अंततः तो
सचमुच कोई किसी का नहीं...
सब साथ हैं
पर हैं तो अजनबी...


अपनी अपनी राह
चले जा रहे हैं...
यूँ ही दो बातें हो गयीं
ज़िन्दगी से कभी...


पर सच है
है तो वो अजनबी...
ज़िन्दगी हठात हाथ छुड़ा कर चल देती है
कठोरता उसकी चुभ गयी अभी... 


कहने सुनने की बातें हैं
सब खोखली बरसातें हैं
झूठे सब नाते हैं
यहाँ ठहरना नहीं कभी...


अपना अपना किरदार अदा कर चल देंगे सभी...
हम थे, हैं, रहेंगे अजनबी... !!

1 टिप्पणियाँ:

Anita 9 दिसंबर 2015 को 5:19 am  

जीवन का यथार्थ..और वास्तव में यही मानव को सम्पूर्ण मानव बनाता है

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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