अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दिसम्बर, स्टॉकहोम और खिड़की से झांकता मन... !!


इस शहर में
ठहरा हुआ दिसम्बर है...


उजाले नदारद हैं इन दिनों...



धूप का चेहरा
कई दिनों से नहीं देखा है उदास तरुवरों ने...



और
न ही बर्फ़ की उजली बारिश है इस बार
कि ढँक ले अँधेरे को... 



रहस्यमयी श्वेत चादर से
आच्छादित रही है धरा, कभी इसी मौसम...
और निर्निमेष देखती रही है जगत के फेरे को...



सुबहें याद करती हैं...
सूरज को...



सूर्यमंत्र के उच्चारण से अँधेरे को ही अर्घ्य समर्पित हो जाता है...
चाँद तब वहीँ कहीं छुपा हुआ मुस्कुराता है...


सूरज न भी दिखे तो क्या ?
सुबहें तो होती हैं... !



लाली ऊषा की
स्मृतियों में शेष है...
उदास दिसम्बर की मिट्टी में समाहित
बिखरी पंखुड़ियों का अवशेष है... !!




3 टिप्पणियाँ:

Anita 26 दिसंबर 2015 को 9:46 am  

दिसम्बर आ गया है तो मार्च भी आने ही वाला है..जब यादों में इतना उजाला है

Onkar 26 दिसंबर 2015 को 10:59 am  

सुन्दर रचना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 26 दिसंबर 2015 को 12:00 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (27-12-2015) को "पल में तोला पल में माशा" (चर्चा अंक-2203) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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