अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जिजीविषा के तीरे, उगता रहे सुकून... !!

अक्षर अक्षर हो सुकून
जैसे स्वर लहरियों में तैरता राम धुन...


अपनी दिशा पा जायेगा
मन, सुन कभी अपनी भी आवाज़ सुन... 


नहीं ज़ख्मी होंगे पाँव
कुछ दूर के कांटे तो तू ले चुन... 


यहाँ के अजब हैं तौर तरीके
दुनिया है, खुशियाँ यहाँ न्यून...



आँखों में जो झिलमिल बूंदें हैं
उनसे ही कोई प्रकाशवृत्त बुन...


कैसा भी भयावह हो दृश्य
कभी शेष न होने पाए जीवन धुन... 


जिजीविषा के तीरे, उगता रहे सुकून... !!



1 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 2 दिसंबर 2015 को 3:10 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 3 - 12 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2179 में दिया जाएगा
धन्यवाद

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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