अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक आग है जिसमें जीवन हर क्षण जल रहा है... !!

उस
धुंधले से नज़र आते पेड़ की आड़ में
हम खड़े हों...
खेल ये आँख-मिचौनी के
जीवन के लिए अवश्यम्भावी हों
कहीं न कहीं बहुत बड़े हों...


किस्मत के साथ...
अपने साथ...
अपने अपनों के साथ...


ये आँख-मिचौनी का खेल ही तो चल रहा है...
कभी "होनी" खल रही है, कभी अपना यूँ होना खल रहा है...


एक आग है जिसमें जीवन हर क्षण जल रहा है... !!




0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ