अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कुछ शीर्षकविहीन टुकड़े... !!

अपने ही स्वभाव के ही कारण
छले जाते हैं हम...


ह्रास के ऐसे माहौल से उम्मीद भी क्या करनी...

भावनाओं का मान रखा जाना तो बीते समय की बात है...
अब सर्वोपर्री अगर कुछ है तो स्वार्थ है...  


ऐसी अजीब स्थिति में
अपने आप से ही नाराज़गी होती है
और छलने वाला तो इस सबसे अनभिज्ञ
मग्न ही रहता है...
एहसास की सीमाओं से बहुत दूर उसका आशियाँ जो है...
वहाँ स्वार्थ के सिवा कुछ होता भी कहाँ है... !!

*** *** ***

एक वक़्त आता है
जब मन उदारता से
माफ़ कर देता है हर चोट पहुँचाने वाले को...

औरों के दोष न निकाल
मन अपना ही दोष देखता है
कि कोई कमी होगी
जिसकी सजा में
अवांछनीय मनःस्थितियों का सामना करना पड़ा... करना पड़ता है... 


दुःख बढ़ता ही जायेगा जो आगे न बढ़े तो...

मन की गाँठ खोल माफ़ करना ही उचित है...
अपने ही स्वार्थ के लिए...
क्रोध से मुक्ति के लिए...
मन की शान्ति के लिए...

ढ़ोते रहने से अपने ही मन का भार बढ़ना है... !!


*** *** ***

जहाँ स्नेह है
वहां सारे तर्क वितर्क
नेपथ्य में चले जाते हैं...

स्नेह
किसी अगर मगर के लिए
कोई स्थान ही नहीं छोड़ता...


जीवन! जीवन रहते स्नेहविहीन न होने देना...



*** *** ***

ख़ुशी बहुत सारी गिरहें खोलती है...
उदार बनाती है कई अर्थों में...

दुःख भी कई स्तरों पर हमें मांजता है...
अंतर्दृष्टि देता है...

सुख दुःख जब आएँ तो
तराशे जाने को प्रस्तुत हों हम...

चोट तो सहनी ही होगी
तभी तो पत्थर आकार ले पाएगा कोई... !!


*** *** ***

एग्यारह महीनों का छल
ढ़ोता हुआ
ठिठुरता दिसम्बर
अपने साथ दर्द न लाये
तो और क्या लाये...


जाते जाते
शायद दे जाये
नए समय में
नए सपनों की...
नयी दृढ़ताओं की सौगात... !!

1 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 3 दिसंबर 2015 को 3:29 pm  

भावनाओं का मान रखा जाना तो बीते समय की बात है...
अब सर्वोपर्री अगर कुछ है तो स्वार्थ है...

और यही स्वार्थ घुन की तरह खा रहा सबको

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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