अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सदियों का ये नाता है...!

कहने को कितना कुछ है, और नहीं है कुछ भी
कि बिन कहे ही हो जानी हैं
सब बातें संप्रेषित 


हम नहीं समझ पाते कभी
उन अदृश्य तारों को
जो जोड़ता है हमें...
अनचीन्हे ही रह जाते हैं
स्नेहिल धागे
जो बांधते हैं हमें... 



हम ये नहीं सोच पाते कई बार
कि जिस एक ही चाँद को
निर्निमेष निहार रहे हैं हम
वह सम्प्रेषण का सदियों से अद्भुत माध्यम रहा है
एक मन का विम्ब दूसरे में बो आता है 


तेरा मेरा सदियों का नाता है... ... ...


सूरज से रौशनी लेकर चाँद जगमगाता है
धरती की खातिर दोनों का उद्देश्य एक हो जाता है 



जीवन के बीज सकल
धरती पर लहलहाये
चाँद सूरज इसी दुआ संग
सदियों से उगते आये 


उनको युगों युगों से उगना और डूबना भाता है
ये कोई आज कल की बात नहीं... सदियों का ये नाता है...!!

17 टिप्पणियाँ:

रविकर 25 नवंबर 2013 को 4:49 am  

बढ़िया प्रस्तुति है आदरेया-
आभार आपका

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 25 नवंबर 2013 को 4:49 am  

Komal, madhur aur samvedansheel!!

Anupama Tripathi 25 नवंबर 2013 को 5:01 am  

कुछ तो है जो कभी नहीं बदलता ....!!
प्रकृति के शाश्वत सत्य....जीवन यूं ही चलता रहे ....संवेदनशील कविता अनुपमा ......!!

KAHI UNKAHI 25 नवंबर 2013 को 5:54 am  

बहुत सुन्दर...बधाई...

प्रियंका

Anita 25 नवंबर 2013 को 8:29 am  

भावभीनी प्रस्तुति..

Mukesh 25 नवंबर 2013 को 2:15 pm  

सुन्दर

स्नेहिल शीतलता जो हममें मार्ग बनाती है
जो जोड़ती है दो पिण्डों के ह्रदय को
और दोनों को तरल करती है बराबर
ऐसे ही नाते बोती है
लहलहाती है
और
सबल बीज छोड़ के
आकार देह मोड़ के
निराकार हो जाती है

सदियों का नाता है

Rajesh Kumari 25 नवंबर 2013 को 6:02 pm  

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि कि चर्चा कल मंगलवार २६/११/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है।मेरे ब्लॉग पर भी आयें ---http://hindikavitayenaapkevichaar.blogspot.in/पीहर से बढ़कर है मेरी ससुराल सखी(गीत

Ashok Saluja 25 नवंबर 2013 को 6:08 pm  

अनु की सोच है बहुत अच्छी
आप का लिखा चाहे न समझू
पर लिखा आपका ,,,पढना
मुझे भी बहुत भाता है ....:-) खुश रहो !

Saras 25 नवंबर 2013 को 7:13 pm  

वाकई.....!!!!!!

Kalipad Prasad 26 नवंबर 2013 को 3:47 am  

जीवन के बीज सकल
धरती पर लहलहाये
चाँद सूरज इसी दुआ संग
सदियों से उगते आये

खुबसूरत अटल सत्य !
(नवम्बर 18 से नागपुर प्रवास में था , अत: ब्लॉग पर पहुँच नहीं पाया ! कोशिश करूँगा अब अधिक से अधिक ब्लॉग पर पहुंचूं और काव्य-सुधा का पान करूँ | )
नई पोस्ट तुम

expression 26 नवंबर 2013 को 4:30 am  

सूरज से रौशनी लेकर चाँद जगमगाता है
धरती की खातिर दोनों का उद्देश्य एक हो जाता है
बहुत सुन्दर !!!!

अनु

Neeraj Kumar 26 नवंबर 2013 को 4:37 am  

बहुत सुन्दर भाव सम्प्रेष्ण ..

जयकृष्ण राय तुषार 26 नवंबर 2013 को 5:16 am  

हम नहीं समझ पाते कभी
उन अदृश्य तारों को
जो जोड़ता है हमें...
अनचीन्हे ही रह जाते हैं
स्नेहिल धागे
जो बांधते हैं हमें...
बहुत ही सुन्दर कविता |

Udaya 26 नवंबर 2013 को 5:45 am  

वह सम्प्रेषण का सदियों से अद्भुत माध्यम रहा है...एक अकाट्य तर्क :) :)

Maheshwari kaneri 26 नवंबर 2013 को 8:14 am  

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति..आभार..

आशा जोगळेकर 26 नवंबर 2013 को 8:50 am  

सुंदर कविता अनुपमा जी।

Pallavi saxena 26 नवंबर 2013 को 11:44 am  

सच इस दुनिया में हर एक का, एक दूजे से कोई न कोई नाता है। ठीक उस गीत की तरह तेरा मुझ से हैं पहले का नाता कोई यूं ही नहीं दिल लुभाता कोई .... बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना।

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