अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कितनी ही बार ऐसा होता होगा...!

कितनी ही बार ऐसा होता होगा...
हंसती हुई डगर पर मन रोता होगा... 


मन की अपनी दुनिया है
उसके अपने किस्से हैं...
उसकी अपनी कहानियां है,
वह अपनी मर्जी से
गम के प्याले पीता होगा
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...! 


संसार के अपने तौर तरीके हैं
मन का संसार निराला है...
कहीं कुछ गहरे तो कहीं रंग कुछ फीके हैं,
उन रंगों में इंतज़ार का अनूठा रंग
बरबस जीता होगा
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...!



फूलों का मुरझाना औ' पुनः खिलना
हारे थके मुरझाये हुए मन को जैसे...
साक्षात किसी ज्योत का मिलना
कितने तार-तार अरमानों को वह फिर
अनगढ़ प्रयास से सीता होगा
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...! 



हंसती हुई डगर पर मन रोता होगा...
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...

7 टिप्पणियाँ:

Yashwant Yash 23 नवंबर 2013 को 5:35 am  

कल 24/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

निहार रंजन 23 नवंबर 2013 को 7:47 am  

जीवन का दस्तूर ही यही है. चाहे अनचाहे आशना होना ही होता है अक्सर उन्ही चीजों से जो अवांछित हो.

पर मन है...खुद ही गिरता है, खुद ही उठता है, खुद ही चलता है. सुन्दर रचना.

Anupama Tripathi 23 नवंबर 2013 को 9:51 am  

जीवन की कठिन डगर और मन की जिजीविषा ...सबल मन सामंजस्य बैठा ही लेता है ....
सुंदर रचना ....

रविकर 23 नवंबर 2013 को 10:20 am  

बढ़िया प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-

Onkar 23 नवंबर 2013 को 2:50 pm  

सुन्दर रचना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 24 नवंबर 2013 को 3:26 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार को (24-11-2013) बुझ ना जाए आशाओं की डिभरी ........चर्चामंच के 1440 अंक में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Mukesh Pandey 24 नवंबर 2013 को 7:50 am  

संसार के अपने तौर तरीके हैं
मन का संसार निराला है...
कहीं कुछ गहरे तो कहीं रंग कुछ फीके हैं,
उन रंगों में इंतज़ार का अनूठा रंग
बरबस जीता होगा
कितनी ही बार ऐसा होता होगा...!
सत्य दर्शाती सार्थक रचना।

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