अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कुछ इस तरह...!

अपनी बेचैनी का
कारण
खोज रही है...
मन के कोने में बैठी
अनचीन्ही
एक भाषा...


वह भाषा
जो शायद कह पाये
सबसे सुन्दर शब्दों में
तुमसे...
सुख दुःख की परिभाषा 


कि तुम
बुन सको फिर अक्षरों से शब्द
शब्द से भाव
और भावों में
बह आये समाधान
कुछ इस तरह... 


लेते रहते हैं
जीवनपर्यंत
हे जीवन!
हम
तुम्हारा नाम
जिस तरह!  


अपने अनमनेपन का
कारण
खोज रही है…
बड़े आस से
भोली भाली
जिज्ञासा... 


वह जिज्ञासा
जो अपनी आत्मीयता से
कर भावविभोर तुम्हें
कह जाए तुमसे...
जीवन है आशा 


कि तुम
सुन सको फिर
अपने होने का संगीत
खिल जाए मन के क्षितिज तुम्हारे
पावन प्रात औ' प्रीत
कुछ इस तरह...  


लेते रहते हैं
जीवनपर्यंत
हे जीवन!
हम
तुम्हारा नाम
जिस तरह!!  

7 टिप्पणियाँ:

डॉ. मोनिका शर्मा 17 नवंबर 2013 को 4:38 pm  

प्रीत का एक रंग ये भी...... सुंदर रचना

सरिता भाटिया 17 नवंबर 2013 को 5:07 pm  

नमस्कार !
आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [18.11.2013]
चर्चामंच 1433 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
सादर
सरिता भाटिया

Dr. sandhya tiwari 17 नवंबर 2013 को 5:33 pm  

sundar rachna ........man ke pas hi hota hai har ahsas ka jabab............

madhu singh 18 नवंबर 2013 को 2:10 am  

खूबशूरत अहसासों को पिरोये हुए सुन्दर भावों का संचार करती सुन्दर प्रस्तुति

मन के - मनके 18 नवंबर 2013 को 3:43 am  

जीवन का बहुआयामी मानवीयकरण सुंदर बन पडा है.

Anita 18 नवंबर 2013 को 5:21 am  

जीवन तो हर पल हमें पुकारता है...सुंदर भाव !

Vaanbhatt 19 नवंबर 2013 को 6:29 am  

खूबसूरत एहसास लिए रचना...

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आज कैसे
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मेरे आँगन में...
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