अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता के पास...!

मेरे आसपास
नहीं होता कोई
जो सुने
मेरी बातें...
समझे मेरी उलझनें...


मेरे डर को
पुरुषार्थ में बदल दे...
ऐसी कोई सम्भावना नहीं नज़र आती
जो आश्वस्त करे
हँसते गाते पल दे... 


जाने क्या दोहराती है
आती जाती सांस...
निराश हताश मन से
छिन जाता है धरती और आकाश...


ऐसे में मैं
लिखती हूँ शब्द
शब्दों में तराशती हूँ अर्थ
और फिर कोई रंग लेकर इन्द्रधनुष से
रंग देती हूँ स्याह से मंज़र 


अँधेरा बढ़ता ही रहता है लिए हाथ में खंजर 


तब शब्दों में पिरो कर खुद को
राह बनाती हूँ...
नहीं पहुँच पाती तुम तक
शब्द सेतु निर्मित करती जाती हूँ...


ये सेतु तुमसे मुझको जोड़ेंगे
यही हमारा मौन तोड़ेंगे 


बनी रहे
ये आस...
भले न हो समाधान कोई
पर जिलाए जाने की
संजीवनी
तो है ही न
कविता के पास...!!

12 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi 20 दिसंबर 2013 को 5:59 am  

संवेदनाएं प्रखर हों राहें निखरती ही जातीं हैं ....शब्द शब्द सेतु बनाते चले जाते हैं .....
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...

राजीव कुमार झा 20 दिसंबर 2013 को 6:39 am  

बहुत सुंदर रचना.

राजीव कुमार झा 20 दिसंबर 2013 को 6:43 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-12-2013) "हर टुकड़े में चांद" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1468 पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

कालीपद प्रसाद 21 दिसंबर 2013 को 3:15 am  

कविता ही संजीवनी है कवि के लिए !
नई पोस्ट मेरे सपनों का रामराज्य ( भाग २ )

KAHI UNKAHI 21 दिसंबर 2013 को 6:22 am  

कलम से पैदा हुई ये शब्द रूपी संजीवनी यूं ही अपना प्रकाश बिखेरती रहे...| बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है...| जब शब्द यूं दिल से निकलते हैं तो सीधे दिल तक ही जाते हैं...|

निहार रंजन 21 दिसंबर 2013 को 8:11 am  

चलती रहे यह सृजन-प्रक्रिया. शुभकामनायें.

Anita 21 दिसंबर 2013 को 11:05 am  

समाधान शब्दों में नहीं उसके भी पार है..हर शब्द की सार्थकता मौन में है

प्रवीण पाण्डेय 22 दिसंबर 2013 को 3:33 pm  

कविता औषधि बन कर रहती है लेखनी में।

Rewa tibrewal 28 दिसंबर 2013 को 6:27 am  

sundar prastuti

Onkar 28 दिसंबर 2013 को 12:44 pm  

सुन्दर रचना

Reena Maurya 28 दिसंबर 2013 को 3:12 pm  

कविता मन शांति सी है..
बहुत ही सुन्दर रचना...
http://mauryareena.blogspot.in/
:-)

Mukesh Pandey 30 दिसंबर 2013 को 10:30 am  

बहुत खूब

"खून निकले तो ज़ख्म लगती है,
वरना हर चोट नज्म लगती है"
गुलज़ार

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