अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

लिखना क्यूँ ज़रूरी है...?

लिखना...
मृत्यु से गुज़र कर
मृत्यु को जीतने जैसा है...


लिखना...
मेरे लिए
किसी बेहद अपने की
ऊँगली पकड़ कर चलने जैसा है...


लिखना...
तड़प को
घड़ी भर का विराम दे जाता है...


लिखना...
बेचैनियों को
भला सा एक नाम दे जाता है...


लिखना...
जाने-अनजाने लिखना
रेत में जल की तलाश के अनवरत क्रम जैसा है...


लिखना...
मेरे लिए
निराश हताश वीराने तट से
जीवन की ओर लौटने के अनिवार्य उपक्रम जैसा है...


अपने आप से
संवाद ज़रूरी है...
जीवन के थपेड़ों का
प्रतिवाद ज़रूरी है...
इस पथ पर चलने वाली
हर आस...
जाने क्यूँ???
आधी-अधूरी है...

कंटकाकीर्ण 

पथरीली राहों पर चलते हुए
हौसला बना रहे

शायद इसलिए... लिखना ज़रूरी है...! 

5 टिप्पणियाँ:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 29 दिसंबर 2013 को 6:20 pm  

क्या बात! वाह! जी वाह!

ऐ ग़ाफ़िल! दिल की सल्तनत अपनी हारकर देख फिर सिकन्दर तू

तीन संजीदा एहसास

Anita 30 दिसंबर 2013 को 3:51 am  

अपने आप से
संवाद ज़रूरी है...
जीवन के थपेड़ों का
प्रतिवाद ज़रूरी है...
इस पथ पर चलने वाली
हर आस...
जाने क्यूँ???
आधी-अधूरी है...
कंटकाकीर्ण
पथरीली राहों पर चलते हुए
हौसला बना रहे

शायद इसलिए... लिखना ज़रूरी है...!
बहुत ठीक कहा है आपने अनुपमा जी, लिखना मन को थाम कर रखने के लिए जरूरी है, खुद से रूबरू होने के लिए जरूरी है..लिखना उस अदृश्य से भी सम्बन्ध बनाये रखने के लिये जरूरी है...

जयकृष्ण राय तुषार 31 दिसंबर 2013 को 1:24 am  

सुन्दर कविता |नववर्ष की शुभकामनाएँ |

Mukesh Pandey 13 जनवरी 2014 को 10:20 am  

अपने आप से
संवाद ज़रूरी है...
सच बहुत सच,
उम्दा रचना :)

प्रियंका गुप्ता 13 जनवरी 2014 को 2:25 pm  

बहुत खूब...कितने अच्छे से बयान कर दिया आपने लिखना क्यों ज़रूरी है...|
बधाई...|

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ