अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ललित, आपके लिए...!

पहले भी लिखा है इसी शीर्षक से आज फिर यूँ ही कुछ लिख जाने का मन है... आपकी प्रेरणा से आपके लिए...


विचलित हो जाता है मन
रो पड़ता है
समस्यायों का एक समूचा व्यूह
मुझे जब तब जकड़ता है 


सबसे हो दूर कहीं खो जाने की
इच्छा होती है
वजह बेवजह
आँखें बेतरह रोती हैं 



दिशा कोई नज़र नहीं आती
पथ की पहचान नहीं हो पाती 


तब, जो
खिल आता है
समाधान बन कर...
गूँज उठता है
स्वयं
हरि नाम बन कर...
वह
पावन प्रभात हैं आप
भईया, नेह आशीषों की
हमको मिली
अनुपम सौगात हैं आप 


यूँ ही लिख जाना था
बस शब्दों को आप तक आना था
सो लिख गयी
कविता ओझल ही रहती है हमेशा
बस आज एक झलक सी उसकी दिख गयी 


सदा सर्वदा रहें आप
यूँ ही उज्जवल दैदीप्यमान
मिलती रहे दिग दिगंत तक
पथ को आपसे पहचान!

5 टिप्पणियाँ:

रविकर 12 नवंबर 2013 को 6:17 am  

सुन्दर प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-

ललित कुमार 12 नवंबर 2013 को 6:54 am  

मैं तो मात्र दिया हूँ अनुपमा। पथ को उजागर तो प्रकाश करता है। तुम्हारी राहों के लिए प्रकाश तो वो सर्वेश्वर भेजता है -अगर मैं कुछ हूँ तो उस प्रकाश को फैलाने का एक निमित्त मात्र हूँ। खुश रहो। किसी भी समस्या से विचलित मत होना... जब तक दिया है -वो प्रकाश का निमित्त बना रहेगा।

ashish 12 नवंबर 2013 को 8:53 am  

bahut sundar aur bhav pravan.

Saras 13 नवंबर 2013 को 5:16 am  

बहुत सुन्दर.....यह स्नेह ...सदा विशिष्ट रहा है ...रहेगा.

Anju (Anu) Chaudhary 13 नवंबर 2013 को 3:24 pm  

बहुत खूब

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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