अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जाने क्या...!

इतने अकेले क्यूँ हो जाते हैं हम कि हमारी चीख भी नहीं पहुँचती किसी तक... हमारा फूट फूट कर रोना भी सुकून नहीं देता कि आंसू भी जैसे अपने न हों... इस वर्ष की शरुआत रोते हुए ही हुई थी और जब जा रहा है तो भी यह वर्ष बेतरह रुला रहा है... मन बहुत उदास है... कहीं कोई सिरा नहीं मिलता... अजब स्थिति है... कहीं कोई नहीं है... दुनिया यूँ रमी हुई है अपनी धुन में कि न किसी को किसी से कोई लेना देना है न किसी को किसी की फ़िक्र ही है... कुछ रीत ही ऐसी है शायद... सब समझदार हैं... नासमझी सिर्फ मेरे ही पल्ले आई है...
निराश हताश मन से हम टुकड़े समेट रहे हैं... कांच के टुकड़ों को समेटना आसान कहाँ... कहीं न कहीं लग ही जायेगी हाथ में कोई नोक और लहुलूहान हो जाने हैं सारे आस विश्वास के प्रतिमान!
हाथ जो है जख्मी वह तो ठीक हो जाएगा पर मन जो हो छलनी तो भी क्या भर जाते हैं जख्म... कौन जाने!


बारिश की बूंदें
बूंदों में भींगती हुई मैं...


कोहरे में डूबी धरती
और अपने गंतव्य की ओर भागती हुई रेल...


पटरियों पर पसरी उदासी
और उन उदासियों को अपने भीतर सींचती हुई मैं...


हम सब साथ चले दूर तक अकेले
फिर ले ली अपनी अपनी राह...
किसी ने किसी को फिर याद नहीं किया
नहीं हुई किसी को किसी की परवाह...


धरती कोहरे से घिरी रही...
पटरियां उदासियों को जीती रहीं...
रेल भाग रही थी... भागती रही...
और मैं...
मैं थी ही कहाँ... मैं कहीं भी तो नहीं...!

3 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 28 दिसंबर 2013 को 1:45 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (28-12-13) को "जिन पे असर नहीं होता" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1475 में "मयंक का कोना" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita 28 दिसंबर 2013 को 7:36 am  

अनुपमा जी, एक कहावत आपने भी सुनी होगी रोओगे तो अकेले रोना होगा हंसोगे तो सारा जमाना साथ देगा...रोना किसे भाता है..सारी सृष्टि हँस रही है..फूल हँस रहे हैं..पर यह हँसी दिल से निकलनी चाहिए...दिल को टटोलें तो सही गहरे और गहरे जहाँ हँसी फूटी पड़ रही है

Onkar 28 दिसंबर 2013 को 12:56 pm  

सुन्दर रचना

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