अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सागर, अपनी अनुभूतियाँ कहते रहना...!

सागर किनारे... वहाँ इस समय जाना चाहिए...!
ठण्ड से ठिठुरती... अपने एकांत में मुस्कुराती... निर्जन तट से टकराती लहरों के बीच...! व्याकुल मन की समस्त उलझनें दूर हो जाएँगी, कुछ पलों के लिए ही सही... सम्पूर्ण कोलाहल मन का शांत हो जाएगा... प्रकृतिस्थ हृदय समस्त चिंताओं से मुक्त दूर क्षितिज पर उगने वाले सूर्य को प्रणाम निवेदित कर अपने भीतर भी कुछ किरणें समाहित कर लेगा...!
बाहें फैलाये... स्वागत करते सागर के तट पर इस सर्द मौसम में एक बार जाना ही चाहिए... ये देखने कि वह अकेला हो कर भी तनिक विचलित नहीं है...!
एक मौसम था न जब इसी तट पर कितनी भीड़ हुआ करती थी... कितनी चहल पहल... कितना तो उत्सव का माहौल... ग्रीष्म के वो दिन जब जमघट लगा हुआ होता था... सुबह से शाम तक सागर एक पल के लिए भी अकेला नहीं होता था... और ये ज्यूँ मौसम बदला अब कहाँ है जमघट... भीड़ क्या... उस भीड़ का कोई भी हिस्सा भूल से भी नहीं आता सागर के पास...
सागर को पता है सब मौसम के मेहमान हैं... सब अपने मतलब से आते हैं... सागर से किसी को कोई लगाव नहीं है... कोई नहीं प्यार करता लहरों से... सब को अपनी अपनी सहूलियतों से प्यार है...!
मैंने देखा... सवेरे सवेरे गयी थी मैं बीते कल सागर के पास... देखा मैंने तट भी यथावत था... सागर लहरें वृक्ष पहाड़ सब यथावत थे और खुश भी... उस एकांत ने किस तरह मेरे एकांत को अपने भीतर समा लिया इसको लिखने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है... लिख पाती तो अवश्य लिखती वह एहसास... कि उस एहसास ने टूटे हुए मेरे मन को किस तरह जोड़ने का भरसक प्रयास किया...!
बाहें फैलाये सागर को देख फूट फूट कर रोई मैं... तिरस्कृत संवेदनाओं को कितने ही समय बाद यूँ कोई गले लगाने को तत्पर था... और वो भी इस आत्मीयता के साथ! कितने ही दिनों बाद तो आई थी मैं इन रज कणों तक... इन लहरों तक... फिर भी कोई बेगानापन नहीं था... कंटक वन से आया कोई पथिक ज्यूँ फूलों का एक उपवन पा गया हो... दूर दूर तक निराश वातावरण में जैसे अकस्मात् सूर्योदय की सम्भावना दिखी हो... असह्य पीड़ा से आहत  मन को जैसे संजीवनी मिल गयी हो...!
आज अभी जब लिख रही हूँ तो मन ही मन उस सागर के पास ही हूँ... और आंसू नहीं थम रहे...
चलूँ आज भी उधर ही... तट पर बैठ कर पेंडिंग असाइनमेंट्स कम्पलीट करूंगी... अब कितने दिन यूँ टाला जाए आवश्यक कार्यों को... मन का क्या है? उसे कहाँ ठीक होना है... एक गुजरेगी दूसरी विपत्ति आ जाएगी...! विपत्तियों के बीच ही जीना है... सारे आवश्यक कार्य भी निपटाने हैं... अब सांस लेना तो स्थगित नहीं किया जा सकता न...
यही तो हम करते हैं... केवल सांस ही तो लेते हैं... सांस लेने और जीने के बीच एक अंतराल है... एक दूरी है जिसे शायद ही हम पाट पाते हैं कभी...! हाँ, ये सागर कर पाता है... लहरें कर पाती हैं ऐसा... वो सांस भी लेते हैं... जीते भी हैं तभी तो आने वाले अनजान पथिक के सूने नयनों में भी जीवन की आस जगा पाते हैं...!


हे अनंत सागर!
इन ठिठुरती हवाओं में भी
तुमने इतनी आत्मीयता भर दी है 


कि
नहीं कांपी मैं
इनके सान्निध्य में


लहराती हुई लहरों को
देखते हुए...
मन के कितने ही घाव बिसराने का
करती रही प्रयास...


ये और बात है...
असफल रहा
मेरा हर प्रयत्न

कि...
मन तो अभी भी
टूटा है...
मेरे भीतर ही एक कोना है
जाने क्यूँ?
मुझसे ही रूठा है...! 


आज भी
उदास हूँ...
मन ही मन
तेरे पास हूँ...

ये लिख लूं एहसास
बीते कल के...
फिर आती हूँ
तुम्हारे ही पास चल के... 


सागर!
तुम्हारे ही तट पर
रज कणों के बीच मुझे
ज्योति मिलेगी...
दूर
पहाड़ों के पीछे से
सूर्य की लालिमा
खिलेगी...


वैसे ही
जैसे कल हुआ था...
तुमने
मेरी आत्मा को छुआ था...!


यूँ ही
बहते रहना...
सागर! अपनी अनुभूतियाँ
कहते रहना...!

6 टिप्पणियाँ:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 31 दिसंबर 2013 को 7:02 am  

kya baat

Maheshwari kaneri 31 दिसंबर 2013 को 12:37 pm  

बहुत सुन्दर...आप को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

vandana gupta 31 दिसंबर 2013 को 1:53 pm  

नववर्ष 2014 सभी के लिये मंगलमय हो ,सुखकारी हो , आल्हादकारी हो

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 31 दिसंबर 2013 को 4:48 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
गये साल को है प्रणाम!
है नये साल का अभिनन्दन।।
लाया हूँ स्वागत करने को
थाली में कुछ अक्षत-चन्दन।।
है नये साल का अभिनन्दन।।...
--
नवल वर्ष 2014 की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Anita 1 जनवरी 2014 को 12:36 pm  

सागर तो सदा तैयार है....हमारी गहराइयों में वही तो छिपा है

Amrita Tanmay 11 जनवरी 2014 को 7:20 am  

नि:शब्द

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