अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

इस बार वह कह पायी...!

एक उदास सा दिन
और एक उदासी भरी शाम...
जब हम समेट रहे थे,
एक एक शब्द याद हो आये
जो तुमने कहे थे... 


कितनी ही
आस विश्वास की बातें...
हमें रुला रही थी,
जाने कैसी एक आवाज़ थी
जैसे हमें बुला रही थी... 


हम ठोकर खाते रहे
गिरते रहे...
गिर गिर कर सँभलते रहे,
याद नहीं दर्द ने कितना विचलित किया
जाने कितने तो आंसू ढलकते रहे... 


फिर सुन्न हो गया मन
देख कितने ही व्यवधान...
राह में कितनी सारी अड़चन,
समय की बहती धारा कब जान पायी
किनारों की उलझन... 


जिंदगी सब देख रही थी,
धीरे से मुस्कुरायी...
कहने को उसके पास भी नहीं होता अक्सर कुछ भी
पर फिर भी इस बार वह कह पायी-


चलते रहो...
जलते रहो...


गिरते रहो...
सँभलते रहो...


आंसुओं को आस में बदलते रहो...!

12 टिप्पणियाँ:

KAHI UNKAHI 12 दिसंबर 2013 को 12:49 am  

Ansuon ko aas mei badalte raho...bahut khoob...iss khoobsurat rachna k liye hardik badhaee...

Priyanka

Kaushal Lal 12 दिसंबर 2013 को 2:46 am  

समय की बहती धारा कब जान पायी
किनारों की उलझन... सुन्दर उदद्गार .....

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 12 दिसंबर 2013 को 3:45 am  

यह भी एक आंसुओं के समन्दर की यात्रा है.. बहुत सुन्दर!!

Anupama Tripathi 12 दिसंबर 2013 को 4:39 am  

आंसुओं को आस में बदलते रहो...!
चलते रहना ही जीवन है ...

बहुत सुंदर भावभिव्यक्ति .....





रविकर 12 दिसंबर 2013 को 5:13 am  

भाव पूर्ण प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-

Anita 12 दिसंबर 2013 को 8:26 am  

अनुपमा जी, आंसुओं को आस में और आस को आंसुओं में बदलते देर नहीं लगती....अब समय आ गया है इन दोनों के पार निकल जाने का ...

Mukesh Pandey 12 दिसंबर 2013 को 9:57 am  

जिंदगी सब देख रही थी,
धीरे से मुस्कुरायी...
कहने को उसके पास भी नहीं होता अक्सर कुछ भी
पर फिर भी इस बार वह कह पायी-

बहुत सुन्दर :)

Yashwant Yash 12 दिसंबर 2013 को 12:37 pm  

कल 13/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

sushma 'आहुति' 13 दिसंबर 2013 को 4:16 am  

बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
अभिव्यक्ति.......

सुशील कुमार जोशी 13 दिसंबर 2013 को 5:18 am  

बहुत सुंदर !

Reena Maurya 13 दिसंबर 2013 को 8:59 am  

आंसुओं को आस में बदल जाने दो..
कोमल भावपूर्ण अभिव्यक्ति,,,,

प्रवीण पाण्डेय 17 दिसंबर 2013 को 6:32 am  

बढ़ते रहो, प्रतिदिन थोड़ा

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