एक उदास सा दिन
और एक उदासी भरी शाम...
जब हम समेट रहे थे,
एक एक शब्द याद हो आये
जो तुमने कहे थे...
कितनी ही
आस विश्वास की बातें...
हमें रुला रही थी,
जाने कैसी एक आवाज़ थी
जैसे हमें बुला रही थी...
हम ठोकर खाते रहे
गिरते रहे...
गिर गिर कर सँभलते रहे,
याद नहीं दर्द ने कितना विचलित किया
जाने कितने तो आंसू ढलकते रहे...
फिर सुन्न हो गया मन
देख कितने ही व्यवधान...
राह में कितनी सारी अड़चन,
समय की बहती धारा कब जान पायी
किनारों की उलझन...
जिंदगी सब देख रही थी,
धीरे से मुस्कुरायी...
कहने को उसके पास भी नहीं होता अक्सर कुछ भी
पर फिर भी इस बार वह कह पायी-
चलते रहो...
जलते रहो...
गिरते रहो...
सँभलते रहो...
आंसुओं को आस में बदलते रहो...!
11 टिप्पणियाँ:
Ansuon ko aas mei badalte raho...bahut khoob...iss khoobsurat rachna k liye hardik badhaee...
Priyanka
समय की बहती धारा कब जान पायी
किनारों की उलझन... सुन्दर उदद्गार .....
यह भी एक आंसुओं के समन्दर की यात्रा है.. बहुत सुन्दर!!
आंसुओं को आस में बदलते रहो...!
चलते रहना ही जीवन है ...
बहुत सुंदर भावभिव्यक्ति .....
भाव पूर्ण प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-
अनुपमा जी, आंसुओं को आस में और आस को आंसुओं में बदलते देर नहीं लगती....अब समय आ गया है इन दोनों के पार निकल जाने का ...
जिंदगी सब देख रही थी,
धीरे से मुस्कुरायी...
कहने को उसके पास भी नहीं होता अक्सर कुछ भी
पर फिर भी इस बार वह कह पायी-
बहुत सुन्दर :)
बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
अभिव्यक्ति.......
बहुत सुंदर !
आंसुओं को आस में बदल जाने दो..
कोमल भावपूर्ण अभिव्यक्ति,,,,
बढ़ते रहो, प्रतिदिन थोड़ा
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