दिसंबर हमेशा ही उदास होता है... जाने क्यूँ विदा होते हुए उसकी आँखें भी नम हो ही जाती हैं... भले ही वह निर्मम निष्ठुर समय की इकाई है... समय है...!
सभी माह एक के बाद एक आते जाते रहते हैं... उनमें एक रिश्ता है निरंतरता का... एक के बाद जो दूसरा आता है वह उसी वर्ष का हिस्सा होता है... लेकिन दिसंबर इस आशय से अकेला है कि यहाँ आकर... इस पायदान से निरंतरता टूटती है... इसके बाद आने वाली तिथि... इसके बाद का माह नहीं होता इस वर्ष का हिस्सा... वह किसी नए वर्ष की पहली सीढ़ी होती है जिससे होते हुए पुनः उसी दिसंबर तक की राह तय होनी है जिसकी अंतिम परिणति पुनः एक नया वर्ष होगी... और इसी तरह क्रम चलता जाता है... सन... दशक... बीत जाते हैं, ऐसे ही सदियाँ बीत जाती हैं... और वहीँ कोई एक लम्हा हमेशा के लिए रुका रह जाता है... !
हृदय का कैलेण्डर यूँ भी कहाँ समय से ताल मेल बिठा पाता है... यहाँ तारीख और वर्ष नहीं होते अंकित... यहाँ अंकित होते हैं तो सिर्फ लम्हे!
उन्ही लम्हों द्वारा मेरे उदास से दिसंबर के लिए...
सभी माह एक के बाद एक आते जाते रहते हैं... उनमें एक रिश्ता है निरंतरता का... एक के बाद जो दूसरा आता है वह उसी वर्ष का हिस्सा होता है... लेकिन दिसंबर इस आशय से अकेला है कि यहाँ आकर... इस पायदान से निरंतरता टूटती है... इसके बाद आने वाली तिथि... इसके बाद का माह नहीं होता इस वर्ष का हिस्सा... वह किसी नए वर्ष की पहली सीढ़ी होती है जिससे होते हुए पुनः उसी दिसंबर तक की राह तय होनी है जिसकी अंतिम परिणति पुनः एक नया वर्ष होगी... और इसी तरह क्रम चलता जाता है... सन... दशक... बीत जाते हैं, ऐसे ही सदियाँ बीत जाती हैं... और वहीँ कोई एक लम्हा हमेशा के लिए रुका रह जाता है... !

7 टिप्पणियाँ:
अच्छी प्रस्तुति
सुन्दर रचना................. पीछे मुड़कर देखने से दर्द भी होता है और ख़ुशी भी
दिसम्बर को विदा देनी तो है...पर फिर आयेगा लौट कर दिसम्बर..और. एक ...नये अंदाज में
सुन्दर रचना
स्मृतियों से मढ़ी सुंदर अभिव्यक्ति ...!!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
बहुत सुन्दर रचना, भावजनित।
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