अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तुम बेतरह रुलाते हो...!

दिसंबर हमेशा ही उदास होता है... जाने क्यूँ विदा होते हुए उसकी आँखें भी नम हो ही जाती हैं... भले ही वह निर्मम निष्ठुर समय की इकाई है... समय है...!
सभी माह एक के बाद एक आते जाते रहते हैं... उनमें एक रिश्ता है निरंतरता का... एक के बाद जो दूसरा आता है वह उसी वर्ष का हिस्सा होता है... लेकिन दिसंबर इस आशय से अकेला है कि यहाँ आकर... इस पायदान से निरंतरता टूटती है... इसके बाद आने वाली तिथि... इसके बाद का माह नहीं होता इस वर्ष का हिस्सा... वह किसी नए वर्ष की पहली सीढ़ी होती है जिससे होते हुए पुनः उसी दिसंबर तक की राह तय होनी है जिसकी अंतिम परिणति पुनः एक नया वर्ष होगी... और इसी तरह क्रम चलता जाता है... सन... दशक... बीत जाते हैं, ऐसे ही सदियाँ बीत जाती हैं... और वहीँ कोई एक लम्हा हमेशा के लिए रुका रह जाता है... !
हृदय का कैलेण्डर यूँ भी कहाँ समय से ताल मेल बिठा पाता है... यहाँ तारीख और वर्ष नहीं होते अंकित... यहाँ अंकित होते हैं तो सिर्फ लम्हे!
उन्ही लम्हों द्वारा मेरे उदास से दिसंबर के लिए...


तुम
विदा का सन्देश लिए
आते हो...


ठिठुरती हुई तारीखों में
जाने क्या
जड़ जाते हो... 


हम
पीछे मुड़ मुड़ कर देखते हुए
कभी आगे बढ़ नहीं पाते है...
बीते दिसंबर की
स्मृतियों के कितने ही अंश
लगातार पढ़ जाते हो...

कोई पुष्प बसंत का 

मन के फ्रेम में
मढ़ जाते हो... 


तुम बेतरह रुलाते हो...! 

7 टिप्पणियाँ:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 14 दिसंबर 2013 को 7:44 am  

अच्छी प्रस्तुति

Dr. sandhya tiwari 14 दिसंबर 2013 को 9:29 am  












सुन्दर रचना................. पीछे मुड़कर देखने से दर्द भी होता है और ख़ुशी भी

Anita 14 दिसंबर 2013 को 10:52 am  

दिसम्बर को विदा देनी तो है...पर फिर आयेगा लौट कर दिसम्बर..और. एक ...नये अंदाज में

Onkar 14 दिसंबर 2013 को 11:50 am  

सुन्दर रचना

Anupama Tripathi 14 दिसंबर 2013 को 3:08 pm  

स्मृतियों से मढ़ी सुंदर अभिव्यक्ति ...!!

Maheshwari kaneri 14 दिसंबर 2013 को 3:32 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

प्रवीण पाण्डेय 17 दिसंबर 2013 को 4:15 am  

बहुत सुन्दर रचना, भावजनित।

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