अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

फिर भी आस अशेष...!

रात
अपलक
जगे हुए बीती...

अँधेरा हारा
न मैं जीती...! 


कहती ही रही
स्नेहमयी
रात...
देनी चाही
उसने
नींदिया की सौगात... 


पर दीप जल रहा था
तो लौ संग
मैं भी जगी रही...
उसने नहीं माना अपना
पर मैं फिर भी
उसकी सगी रही...


अँधेरे से
उजाले की ही
बात करती रही...
बार बार मैं
आस विश्वास से
अपना दामन भरती रही...


लेकिन
सब जाने कहाँ
गुम हो जाता था...
रिक्त पात्र
स्वयं को लाख प्रयास के बाद भी
रिक्त ही पाता था... 


तार-तार
था दामन
किन धागों से सीती...

अँधेरा हारा
न मैं जीती...!!

लौ को
निहारते हुए
उदास अँधेरे को देखा...
कोहरे से घिरी हुई
बड़ी महीन थी
उजाले और अँधेरे के बीच की रेखा...

जीवन का ही
ताना बाना
दोनों बुन रहे थे...
बारी बारी से
दोनों ही
एक दूसरे की सुन रहे थे...

सूरज का आना
शेष था, फिर भी
गढ़े जा रहे थे उजाले...
एक दीप था
जो जगा रहा साथ
अनगिन सपने पाले...

कोई पंछी नहीं
कहीं कोई आहट नहीं
न ही कहीं आवाज़ कोई...
या तो लौ कभी
लड़खड़ा जाती थी
या फिर कभी मैं रोई...

उदास सी सुबह
फिर भी आस अशेष
यही है जीवन की रीति...
भले ही
न अँधेरा हारा
न मैं जीती...!!!

7 टिप्पणियाँ:

कालीपद प्रसाद 27 दिसंबर 2013 को 5:20 am  

सही है ,न अँधेरा हारता है न जिंदगी जीतती है ...नदी के दो किनारे जैसे दुरी रखकर साथ साथ चलते हैं !
नई पोस्ट मेरे सपनो के रामराज्य (भाग तीन -अन्तिम भाग)
नई पोस्ट ईशु का जन्म !

राजीव कुमार झा 27 दिसंबर 2013 को 6:35 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-12-2013) "जिन पे असर नहीं होता" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1475 पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

Anita 27 दिसंबर 2013 को 7:22 am  

इसी तरह तकते हुए उजाले को एक दिन मिल जायेगा एक ऐसा उजाला जिस के आगे अँधेरा कभी टिकता ही नहीं..जिसका जिक्र कृष्ण गीता में करते हैं..वहाँ न सूर्य का प्रकाश है न चन्द्रमा का...

जयकृष्ण राय तुषार 8 जनवरी 2014 को 4:43 am  

कोई पंछी नहीं
कहीं कोई आहट नहीं
न ही कहीं आवाज़ कोई...
या तो लौ कभी
लड़खड़ा जाती थी
या फिर कभी मैं रोई...

उदास सी सुबह
फिर भी आस अशेष
यही है जीवन की रीति...
भले ही
न अँधेरा हारा
न मैं जीती...!!!
सुन्दर अर्थों से सजी कविता |आभार

Aparna Bose 8 जनवरी 2014 को 7:01 am  

bohat hi bhavpoorn prastuti..

पिरुल...( संदीप रावत ) 8 जनवरी 2014 को 4:50 pm  

आह...मानीखेज

Mukesh 9 जनवरी 2014 को 2:06 pm  

बहुत सुन्दर....

संघर्ष हो या हो अप्रतिकार...
एक ही झीने धागे से
बंधे प्रकाश और अंधकार...
जीवन फलक फैलता है
मौन हो या हाहाकार... ...

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