अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

साझी व्यथा...!

अपरिचय... परिचय... अपरिचय
मृत्यु... जीवन... मृत्यु 


यही कथा है...
इतनी ही व्यथा है! 


जीवन का चक्र
अपरिचय के दौर से
परिचय की सीमा पर
रखता है कदम... 


अपने हो जाते हैं सपने
और फिर देखते ही देखते सपना हो जाता है
अपनों का साथ
होने लगती हैं आँखें नम...


परिचय की सीमा को छूकर
फिर अपरिचय की परिधि में
घिरने लगते हैं हम
घेरने लगता है प्रकाश को तम...


अपरिचय... परिचय... अपरिचय
मृत्यु... जीवन... मृत्यु 


यही कथा है...
इतनी ही व्यथा है! 


अप्रकट और पुनः
एक अंतराल के बाद अप्रकट
दो अप्रकट के बीच जो अंतराल है
बस उतना ही है जीवन...


क्षणिक है जो उसके खो जाने पर
कैसा कष्ट कैसा दुःख
आत्मा अभेद्य है
बस यह सत्य रहे स्मरण...


जो ज़रा सा समय हमारे हिस्से है
वो जी भर कर जीए हम
सत्कर्म और भक्ति भाव का दीप जले
कि मृत्यु के बाद भी जीता है जीवन...


यही कथा है
जीवन अंततः तेरी मेरी साझी व्यथा है...!!!


13 टिप्पणियाँ:

Kalipad Prasad 2 दिसंबर 2013 को 2:21 am  

जीवन क्या है ? दो अपरिचय के बीच परिचय .....दो तम विन्दु के बीच का प्रकाश ....जन्म (मृत्यु ) जीवन मृत्यु ....बहुत सुन्दर परिभाषा ---जीवन दर्शन !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 2 दिसंबर 2013 को 2:56 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (02-112-2013) को "कुछ तो मजबूरी होगी" (चर्चा मंचःअंक-1449)
पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

वाणी गीत 2 दिसंबर 2013 को 3:58 am  

अपरिचय से परिचय , परिचय से अपरिचय ज्यों जीवन से मिलना , बिसरना !
इसी दर्शन के बीच पूरी सृष्टि है !
और सृष्टि में सबकी व्यथा एक जैसी !
प्रभाव पूर्ण दर्शन !

Anupama Tripathi 2 दिसंबर 2013 को 4:16 am  

bodh aur abodh ke beech jhoolta man .....shayad yahi hai jivan ....sundar udgar Anupama ......!!

रविकर 2 दिसंबर 2013 को 4:46 am  

बढ़िया प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-

Yashwant Yash 2 दिसंबर 2013 को 4:54 am  

जीवन चक्र को बहुत ही सुंदर शब्द दिये हैं आपने।


सादर

प्रवीण पाण्डेय 2 दिसंबर 2013 को 2:57 pm  

क्या हैं हम, कैसे आये,
आओ ढूढ़े, जो खोया है।

Rajesh Kumari 2 दिसंबर 2013 को 5:29 pm  

आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल मंगलवार ३ /१२ /१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है

Neeraj Kumar 3 दिसंबर 2013 को 5:21 am  

बहुत ही सुन्दर भाव .. सनातन दर्शन को सुन्दर शब्द दिए है आपने .. बधाई आपको ..

रश्मि प्रभा... 3 दिसंबर 2013 को 8:17 am  

यही कथा है शाश्वत
कोई सपनों को अपना बनाता है
कोई अपनों को सपना …
साँसों के साथ मृत्यु चलती है
मृत्यु के बाद भी रहता है यादों का जीवन

Digamber Naswa 3 दिसंबर 2013 को 1:05 pm  

जीवन दर्शन शब्दों में उतारा है ... ये माया है या असल ... क्या पता ...

sushma 'आहुति' 4 दिसंबर 2013 को 5:17 am  

बेहतरीन अभिवयक्ति.....

Onkar 4 दिसंबर 2013 को 6:26 am  

जीवन दर्शन

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