अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हमने तुम्हें चुन लिया...!

रात भर
जलता रहा
दिया...
जीवन का होना
व्यर्थ नहीं गया...
हम देखते रहे
टिमटिमाती लौ
एकटक,
जागी आँखों ने
जागे जागे
सपना बुन लिया... 


आँखों ने हृदय का
जाने कौन सा भाव
पढ़ लिया...
अश्रूकणों का एक पारावार
हवा में तैर गया...
हम विस्मित से
देखते ही रह गए
निर्निमेष,
जाने किसने
मूक आंसुओं का
कहा सुन लिया... 


सब नियति के खेल हैं
हमने भला
क्या कब किया...
निमित्त मात्र हैं
राहों पर बस निष्ठा से चल लिया...
मार्ग में कितनी ही बार बिखरा मन
ये क्रम कभी नहीं
है होना शेष,
हताश रुके कुछ पल
कोई था नहीं, कौन चुनता?
खुद ही हमने अपना बिखरा मन चुन लिया... 



रात भर
जलता रहा
दिया...
जागी आँखों ने
लौ को पल पल जिया...
रौशनी
तम से लड़ती रही
देर तक,
इसी आस्था की डोर को
अपने सपनो संग
हमने धीरे धीरे बुन लिया...


"तम" और "तुम" में एक को चुनना था...

रौशनी! हमने तुम्हें चुन लिया...!

11 टिप्पणियाँ:

Anita 10 दिसंबर 2013 को 5:34 am  

तम तो तुम का अभाव मात्र है...जहाँ तुम हो वहाँ तम कैसा..

KAHI UNKAHI 10 दिसंबर 2013 को 6:54 am  

रौशनी! हमने तुम्हें चुन लिया...!
क्या बात है...बधाई...|

प्रियंका

Mukesh Pandey 10 दिसंबर 2013 को 8:01 am  

"तम" और "तुम" में एक को चुनना था...
रौशनी! हमने तुम्हें चुन लिया...!
बेहद खूबसूरत लिखा है मैम
really nice :)

Anupama Tripathi 10 दिसंबर 2013 को 8:37 am  

बहुत सुंदर सशक्त रचना ....प्रकाश का संचार कर रही है ....!!बहुत सुंदर ...

रविकर 10 दिसंबर 2013 को 10:03 am  

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

Yashwant Yash 10 दिसंबर 2013 को 10:07 am  

बेहतरीन


सादर

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 10 दिसंबर 2013 को 10:35 am  

क्या बात वाह!

Digamber Naswa 10 दिसंबर 2013 को 12:15 pm  

रोच्नी का चुनाव तम को लील लेगा ... आशाएं जागृत होंगी ...
भावपूर्ण रचना ...

Saurabh 10 दिसंबर 2013 को 12:18 pm  

वाह .. तम नहीं तुम को चुन लिया..
बधाई

Kaushal Lal 11 दिसंबर 2013 को 2:55 am  

सुंदर सशक्त........

देवेन्द्र पाण्डेय 14 दिसंबर 2013 को 4:49 am  

वाह!

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