अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

संदेशे धरती के नाम!

कभी कभी...
सारा दिन
एक सा ही होता है


घिर आने वाली शाम की तरह ही
उदास...! 


बादलों से पटा
समूचा अम्बर...
सूरज का कहीं कोई
अता पता नहीं...
एक अजीब से अँधेरे में घिरी सुबह 


जाने कैसी तो सुबह...!


सुबह का नहीं कोई रंग...
यह सुबह उकेरना भी चाहें
तो नहीं उतरती कागज़ पर
नहीं तो हो लेते स्याही के संग
हा! सुबह कितनी है बेरंग...!



कि तभी अम्बर ने
भेजी धरा के नाम
कुछ सफ़ेद रुई के फ़ाहे सी फुहार...
एक उजली चादर ने ढक लिया
सूखे पत्तों का अम्बार...



अब ये इस मौसम की पहली पहली उजली बारिश
सब ढक लेगी...
मन रखती आई है प्रकृति
हमारा मन रख लेगी...


सब रंग घुल जाएँ तो
श्वेत होता है परिणाम
सारे रंग घोल भेज रहा है अम्बर
संदेशे धरती के नाम!

13 टिप्पणियाँ:

ana 6 दिसंबर 2013 को 6:24 pm  

umda prastuti......saghan bhaw

Yashwant Yash 7 दिसंबर 2013 को 5:28 am  

कितना अच्छा मौसम है स्वीडन का ...:) सफ़ेद रुई के फ़ाहे सी बर्फ फुहार सच मे किसी संदेशे जैसी ही लगती होगी।

लाजवाब शब्दचित्र।

सादर

Yashwant Yash 7 दिसंबर 2013 को 5:29 am  

कल 08/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

रश्मि प्रभा... 7 दिसंबर 2013 को 1:20 pm  

जब भी कभी मन और बाह्य की स्थिति
विपरीत होती है
न सुबह कलम में होती है,न रात
भाव जो उगते हैं पन्नों पर
मन के पन्ने उससे जुदा होते हैं …

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 7 दिसंबर 2013 को 4:53 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (08-12-2013) को "जब तुम नही होते हो..." (चर्चा मंच : अंक-1455) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kaushal Lal 8 दिसंबर 2013 को 3:30 am  

सुबह का नहीं कोई रंग...
यह सुबह उकेरना भी चाहें
तो नहीं उतरती कागज़ पर...........सुन्दर ......

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 8 दिसंबर 2013 को 5:26 am  

एक चित्रकारी सी लगा रही है यह कविता.. प्रकृति के प्रतीकों से रची कविता!!

Anita 8 दिसंबर 2013 को 6:51 am  

मौसम का बहुत ही सजीव वर्णन !

Onkar 8 दिसंबर 2013 को 10:08 am  

सुन्दर प्रस्तुति

sushma 'आहुति' 8 दिसंबर 2013 को 1:45 pm  

भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने..

आशा जोगळेकर 8 दिसंबर 2013 को 1:53 pm  

सफेद रुई के फाये बिखराती सी सुबह यहां कहां पर यहां भी मौसम खुशगवार है।

Maheshwari kaneri 8 दिसंबर 2013 को 6:29 pm  

बहुत सुन्दर सजीव प्रस्तुति...!

Mukesh Pandey 10 दिसंबर 2013 को 8:03 am  

आप खुद में प्रकृति हैं,
बहुत सुन्दर

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