अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तुम तक...!

आवाज़ दे रहे हैं हम
पर खामोश है गगन
जाने क्या कारण है...
दूरी बहुत है...?
या बीच में है शून्य...?
जिससे हो कर
नहीं गुजरती कोई आवाज़... 


नहीं पहुँचते मेरे स्वर वहाँ तक...?
या अनसुनी कर दी जाती है पुकार...?
क्या पता...
बहती ही जाती है क्यूँ
आंसुओं की धार...!  


पहुँचने की कोशिश में
बहुत चले...
बहुत थके... चूर हुए...
अपने आप से ही कई बार दूर हुए...


फिर ज़रा संभले... 


दृढ़ किया टुकड़ा टुकड़ा मन...
समझाते रहे अपने आप को ही हम- 


कि,
बस जरा सा सफ़र और शेष है...
थोड़ा सा धैर्य और फिर संतुष्टि अशेष है...! 


यूँ ही खुद से करते हुए संवाद
खुद को ही देते हुए दिलासा
निरंतर बढे जा रहे हैं हम
हे दुष्प्राप्य मंजिल!
तुम तक चल कर आ रहे हैं हम...!!!



5 टिप्पणियाँ:

Anita 19 दिसंबर 2013 को 6:15 am  

जो मंजिल है, वही तो रास्ता है और राही भी तो वही है...पुकार खुद से उठी खुद को ही सुनानी है..कैसी अबूझ यह जिन्दगी की कहानी है

Anupama Tripathi 19 दिसंबर 2013 को 6:31 am  

हृदयस्पर्शी भाव अनुपमा ...

साईं की नागरी परम अतिसुन्दर
जहां कोई जाये न आवे
चाँद सूरज जहां पवन न पानी
को सँदेसा पहुंचावे
दरद यह साईं को सुनावे ...
अनहद नाद जैसे भाव ...बहुत भावपूर्ण ।

प्रवीण पाण्डेय 19 दिसंबर 2013 को 6:54 am  

संवादों का उत्तर हेतु मन की शान्तिमय प्रतीक्षा भी हो, गहरे प्रश्न समय लेते हैं।

Mukesh Pandey 20 दिसंबर 2013 को 11:41 am  

एक बहुत ही सुन्दर कविता
बहुत अच्छी :)

Jyoti Mishra 1 जून 2015 को 6:11 am  

A void between two people is the longest distance to cover.

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