अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हम भूल गए बंदगी...?

पुरानी डायरी से १९९८ में लिखी गयी रचना::


अगर न होते नैन, जिह्वा और श्रवण शक्ति...
तो, निर्विघ्न चल सकती थी भक्ति...
दरवाज़े सब होते बंद... बस खुला रहता मन का द्वार
शांत हृदय से जुटते हम करने आत्मा का जीर्णोद्धार
भटकाव से परे आत्मलीन होता चिंतन
मन ही मन बस चलता रहता हरिनाम का संकीर्तन


जुटा दिए क्रोध, मद, मोह, लोभ के सारे सामान
और हो गए वो दूर क्षितिज पर अंतर्ध्यान...?
जिससे कोई बिरला ही शान्ति पा सके
करे ठोस प्रयास तब अमृतकलश तक जा सके
यूँ तो बस लहरों में खो जाते हैं
आने वाले जीव यहाँ बस माया के होकर रह जाते हैं!


खूब बनायी दुनिया उसने
मोह ममत्व की खूबियाँ उसमें
दीं चरम शक्तियां इंसानों को
अपनी आसक्तियों की खातिर जलते परवानों को
देने को तो उसने दिया ज्ञान विवेक
पर अविवेकी होने के संबल भी जुटा दिए अनेक....


दिए उसने दो नेत्र ललाम
चहुँ ओर भागे, जो होकर बेलगाम
यही सत्य है...
ये आँखें खूब नाच नचाती हैं
बाह्य सौन्दर्य के आगे-पीछे दीवानों की तरह मंडराती हैं...


श्रवण शक्ति भी है कम बैरन नहीं
जो अशांत किये रहती है हर पल, ये है वही...
भला बुरा सुन सुन कर आक्रोश जगेगा
इधर उधर व्यस्त रहेगा... मन की बातें यह नहीं सुनेगा


जिह्वा सारी पशुता की होती है जड़
स्वाद पर पक्की उसकी पकड़
कटु वचन कहवा कर कई पाप करवाती है
भाषा के चक्रव्यूह में आत्मा को फंसाती है



यही होता है... यही होता रहेगा
सब अपना अपना राग अलापेंगे
अपनी अपनी ही ऐषणा के मन्त्र जापेंगे


घाटे में आखिर कौन रहेगा..?
अरे! इस संसार के फेरे में अन्दर का इंसान ही मरेगा!


फंसा कर ज्योति, ध्वनि और स्वाद के जाल में
ढलते देखती है इंसानों को भेड़ियों की खाल में
कैसी अद्भुत ये सत्ता तेरी ईश्वर...?
भ्रम यथावत बना रहता है, इंसान है कितना विवश नश्वर...??


भ्रामक शक्तियों को इतना स्पष्ट सजाया
फिर क्यूँ आत्मा को इतना सूक्ष्म अस्पष्ट बनाया...?
कि बिना दिव्य प्रयास के, साधारण जन
पहचान सके नहीं, अपना ही अंतर्मन


काहे इतनी क्लिष्ट बनायी ज़िन्दगी
कि अहम् मोह के फेरे में हम भूल गए बंदगी...!!

10 टिप्पणियाँ:

निहार रंजन 8 नवंबर 2013 को 4:52 am  

उस उम्र में आपके चिंतन की गहराई प्रशंसा से परे हैं. प्राणपन से लिखी हुई उकृष्ट कविता.

Rajeev Kumar Jha 8 नवंबर 2013 को 6:29 am  

बहुत सुंदर. छठ पर्व की शुभकामनाएँ.

Rajeev Kumar Jha 8 नवंबर 2013 को 6:33 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-11-2013) "गंगे" चर्चामंच : चर्चा अंक - 1421” पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

Yashwant Yash 8 नवंबर 2013 को 11:47 am  

कल 09/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

Kailash Sharma 9 नवंबर 2013 को 10:38 am  

भ्रामक शक्तियों को इतना स्पष्ट सजाया
फिर क्यूँ आत्मा को इतना सूक्ष्म अस्पष्ट बनाया...?
कि बिना दिव्य प्रयास के, साधारण जन
पहचान सके नहीं, अपना ही अंतर्मन

...गहन चिंतन को संजोये बहुत प्रभावी रचना....

Mukesh Pandey 9 नवंबर 2013 को 1:31 pm  

खूब बनायी दुनिया उसने
मोह ममत्व की खूबियाँ उसमें
दीं चरम शक्तियां इंसानों को
अपनी आसक्तियों की खातिर जलते परवानों को
देने को तो उसने दिया ज्ञान विवेक
पर अविवेकी होने के संबल भी जुटा दिए अनेक....


काहे इतनी क्लिष्ट बनायी ज़िन्दगी
कि अहम् मोह के फेरे में हम भूल गए बंदगी...!!

लाजवाब सभी कुछ कह दिया
आपने इस कविता में,
बहुत सुन्दर।। बधाई :)

Rachana 9 नवंबर 2013 को 7:43 pm  

भ्रामक शक्तियों को इतना स्पष्ट सजाया
फिर क्यूँ आत्मा को इतना सूक्ष्म अस्पष्ट बनाया...?
कि बिना दिव्य प्रयास के, साधारण जन
पहचान सके नहीं, अपना ही अंतर्मन

काहे इतनी क्लिष्ट बनायी ज़िन्दगी
कि अहम् मोह के फेरे में हम भूल गए बंदगी...!!

bahut sunder bhav badhai aapko
RACHANA

Pallavi saxena 10 नवंबर 2013 को 11:26 am  

यही तो विडम्बना है न कि मोह माया में पढ़कर हम बंदगी ही भूल गये...सार्थक संदेश लिए बहुत ही सुंदर भाव अभिव्यक्ति॥

Shikha Gupta 10 नवंबर 2013 को 1:36 pm  

गहन चिंतन से निकली आत्मविश्लेषात्मक रचना
आनंद आ गया

rashmi savita 10 नवंबर 2013 को 5:12 pm  

meaningful realization.

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