अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यूँ ही...!

उदास हैं
सोच रहे हैं
यूँ ही...

क्या केवल
हमको ही
फ़िक्र लगी रहती है...?
सब तक पहुँचने की...


या
कोई ऐसा भी है...?
जिसे
मेरी फ़िक्र हो
जो मेरा हाल जानना चाहे...??


लगता है-
अपने आप को
रख कर कहीं
भूल जायें...


खो जायें...
मौन हो जायें...


कहीं न पहुंचना हो...
न किसी तक...
न कहीं पर... 


न दस्तक दें कहीं...
न किसी आहट की उम्मीद लगायें... 


बस खो जाएँ...
मौन हो जाएँ...!!!

***
कितनी ही बार आता है न ऐसा मन में... हम सब के मन में... कभी न कभी... पर फिर भी हम मौन से कोसों दूर रहते हैं... उलझे रहते हैं अन्यान्य उलझनों में... 
काश! पकड़ पाते मौन का कोई सिरा तो जान लेते हम कि कोई हो न हो हमारा विश्वास... हमारा ईश्वर... हमेशा हमारे साथ ही तो होता है... और इन्हें हमसे कोई दूर भी नहीं कर सकता...
और जिन्हें मन ने बाँध लिया अपने आप में निहित विश्वास से... वो भी दूर होकर कभी दूर नहीं होते... नहीं हो सकते...!!!

13 टिप्पणियाँ:

Mukesh Pandey 21 दिसंबर 2013 को 8:10 am  

काश! पकड़ पाते मौन का कोई सिरा तो जान लेते हम कि कोई हो न हो हमारा विश्वास... हमारा ईश्वर... हमेशा हमारे साथ ही तो होता है... और इन्हें हमसे कोई दूर भी नहीं कर सकता...
वाह सत्य, बहुत सुन्दर :)

Maheshwari kaneri 21 दिसंबर 2013 को 8:14 am  

बहुत बढिया....

Anupama Tripathi 21 दिसंबर 2013 को 8:24 am  

कैसे हो सकता है बताओ तो ...यही विश्वास तो बांधे है हम सब को ....ताज्जुब है वैसे बिलकुल यही भाव आज सुबह सुबह मैंने लिखे ...

जब रहता नहीं कोई भी समीप
सघन तिमिर में
विश्वास का जलता दीप
सघन तिमिर में
अब इसे इत्तेफाक कहूँ या ईश्वर की उपस्थिती ....कोई तो है जो हम सब मे है ....है न ...??:))

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 21 दिसंबर 2013 को 8:57 am  

waah

अनुपमा पाठक 21 दिसंबर 2013 को 9:00 am  

सच, कोई तो है जो हम सबमें है...!
Well said, Anupama Tripathi ji,
...and your lines are beautiful...
Regards,

Anita 21 दिसंबर 2013 को 10:48 am  

मौन का सिरा थामना हो तो एक बार तज देना होगा सारे विश्वासों को...

वाणी गीत 21 दिसंबर 2013 को 12:45 pm  

किसी का साथ न होना ही अपने पास होना है। उसी समय हम ईश्वर के साथ होते हैं !

sushma 'आहुति' 21 दिसंबर 2013 को 3:01 pm  

सुंदर अभिव्यक्ति..

rahul misra 21 दिसंबर 2013 को 5:48 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (22-12-2013) को "वो तुम ही थे....रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1469" पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!!

- ई॰ राहुल मिश्रा

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 22 दिसंबर 2013 को 4:09 am  

आज तो बस इतना ही कहूँगा कि
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी,
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती!!

Rewa tibrewal 22 दिसंबर 2013 को 6:22 am  

man ki baat keh di apne....sach mey aisa lagta hai.....sarthak abhivyakti

Onkar 22 दिसंबर 2013 को 8:25 am  

सुन्दर रचना

प्रवीण पाण्डेय 22 दिसंबर 2013 को 2:26 pm  

सृष्टि में दृष्टि का ही प्रक्षेपण है, मन को जैसा लगता है विश्व वैसा दिखता है। सबके मन को व्यक्त कर दिया।

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