अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

श्रद्धा की राह में...!

ये किस द्वन्द में
पड़ गए हम...
कौन भक्त
कौन भगवन...?


श्रद्धा की राह में
होता है...
दो अव्ययों का
एक ही मन...



कभी कृष्ण
पाँव पखारते हैं,
कभी सुदामा की
आँखें नम...



दोनों में
भेद ही नहीं है,
सखा भाव के समक्ष
सारे भाव गौण... 



आईये
मन की आँखों से देखते हैं-
ये अद्भुत लीला,
ये दिव्य आयोजन... 



और ये सत्य जान कर
मान कर...
इसी क्षण
हो जाएँ अभिभूत हम 



कि... ... ...



श्रद्धा की राह में होता है,
दो अव्ययों का एक ही मन... !!


***

कुछ एक शब्द... कुछ एक भाव... और वही 'प्रेरणा' जो लिख गयी यह पंक्तियाँ...
'प्रेरणा' को नमन करते हुए, कह रहा है मन, भक्त और उनके भगवान की जय...!!!





9 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 21 नवंबर 2013 को 9:09 am  

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति 22-11-2013 चर्चा मंच पर ।।

vandana gupta 21 नवंबर 2013 को 1:47 pm  

jai ho

Anupama Tripathi 21 नवंबर 2013 को 1:54 pm  

अभेद है यह भाव ....ईश्वर के हम या हमारा है ईश्वर ....ठीक इसी तरह ....

Saras 21 नवंबर 2013 को 2:01 pm  

वाकई ......सच्ची मित्रता एक खूबसूरत नेमत है .......उसे सदा संजोना है .....

Yashwant Yash 22 नवंबर 2013 को 5:22 am  

बेहतरीन


सादर

Anita 22 नवंबर 2013 को 10:58 am  

प्रेम गली अति सांकरी...जामें दो न समायें..

Mukesh Kumar Sinha 22 नवंबर 2013 को 1:53 pm  

सुंदर भाव !!

Mukesh Pandey 24 नवंबर 2013 को 7:51 am  

श्रद्धा की राह में होता है,
दो अव्ययों का एक ही मन...

बहुत खूबसूरत।

rafat alam 23 अप्रैल 2015 को 5:27 pm  

ये किस द्वन्द में
पड़ गए हम...
कौन भक्त
कौन भगवन..sundar kavita ..tu deep main jot..tu mujh mein hai main tujh mein

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