अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दर्द... हमदर्द...!

क्या?
हाथ जला लिया?
फिर...?
ओह! कैसे...?
कहाँ रहता है ध्यान...
तुम्हारा?
क्या सोचती रहती हो...?
मन किस शून्य में विचरता है...?
ठोकर खाती हो
गिर जाती हो...


अभी
उसी दिन तो
गिरी थी न...
जाने वो चोट
ठीक हुई भी कि नहीं?
और फिर गिर गयी...
अरे! कैसे...?


यूँ
खुद को ही
डांटते-डपटते हैं...
समझाते हैं... 



कोई उत्तर
नहीं सूझता...
कुछ नहीं कह पाते हैं...


बस इतना ही
महसूस होता है-

एक दर्द
पुराने दर्द की
दवा हो जाता है... 


जब तक जलन
रहती है
हाथ में...
पाँव का दर्द
हवा हो जाता है... 


यूँ ही
दर्द दर्द मिलकर
हमदर्द हो जाते हैं...
रास्ते जाते हैं
सब शून्य की ओर
एक घड़ी बाद सर्द हो जाते हैं...!

13 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi 24 दिसंबर 2013 को 4:58 pm  

सर्द मौसम का असर लेखनी पर भी झलक रहा है ...!!

Shalini Rastogi 24 दिसंबर 2013 को 6:36 pm  

जब तक जलन
रहती है
हाथ में...
पाँव का दर्द
हवा हो जाता है...
................ kitana bada sach kah dala aapne in panktiyon me .. bahut khoob!

Kaushal Lal 25 दिसंबर 2013 को 3:01 am  

दर्द दर्द मिलकर
हमदर्द हो जाते हैं....... सुन्दर .......

Yashwant Yash 25 दिसंबर 2013 को 8:39 am  

बहुत ही बढ़िया

अपना ख्याल रखें।

सादर

Yashwant Yash 25 दिसंबर 2013 को 9:37 am  

कल 26/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

Anita 25 दिसंबर 2013 को 9:45 am  

छोटे दर्द हवा हो जाते हैं जब बड़ा दर्द आता है...सबसे बड़ा दर्द तो हमारा यह असजग मन ही है जब तक यह है तब तक बाकी दर्द बने ही रहेंगे..शून्य होने का भुलावा भले दे दें...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 25 दिसंबर 2013 को 11:30 am  

क्या बात वाह!

अरे! मैं कैसे नहीं हूँ ख़ास?

अब तो तुझे आवाज़ लगाते भी जी डरे

प्रवीण पाण्डेय 25 दिसंबर 2013 को 12:38 pm  

दर्द सर्द हो जाते हैं, समय बीतते बीतते।

कालीपद प्रसाद 26 दिसंबर 2013 को 4:33 am  

समय के साथ हर दर्द को सर्द होना है !
नई पोस्ट मेरे सपनो के रामराज्य (भाग तीन -अन्तिम भाग)
नई पोस्ट ईशु का जन्म !

vandana gupta 26 दिसंबर 2013 को 7:52 am  

बेहतरीन अभिव्यक्ति

Mukesh Pandey 8 जनवरी 2014 को 3:59 pm  

यूँ ही
दर्द दर्द मिलकर
हमदर्द हो जाते हैं...
रास्ते जाते हैं
सब शून्य की ओर
एक घड़ी बाद सर्द हो जाते हैं...!
बहुत सुन्दर कविता :)

ambuj kumar khare 9 जनवरी 2014 को 6:07 am  

Sunder ! Ati Sunder !!

Mukesh 9 जनवरी 2014 को 1:56 pm  

हम सब बच्चे हैं...
गिरते है, उठते हैं और चलना सीखते हैं...
स्मृतियाँ पुरानी होती जाती है...
पर हर पग नया होता है
ठोकर भी नयी और दर्द भी नया होता है...
दर्द के दरार में नयी रौशनी प्रवेश करती है...
नयापन का अनुभव हमें बहाता है...
जीवन पुनः नया हो जाता है...

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