अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

विस्मित हम!

कैसे जुड़ जाते हैं न मन!
कोई रिश्ता नहीं...
न कोई दृष्ट-अदृष्ट बंधन...
फिर भी
तुम हमारे अपने,
और तुम्हारे अपने हम...


भावों का बादल सघन
बन कर बारिश,
कर जाता है नम...
उमड़ते-घुमड़ते
कुछ पल के लिए
उलझन जाती है थम...


जुदा राहों पर चलने वाले राहियों का
जुदा जुदा होना,
है मात्र एक भरम...
एक ही तो हैं,
आखिर एक ही परमात्म तत्व
समाहित किये है तेरा मेरा जीवन... 



भावातिरेक में
कह जाते हैं...
जाने क्या क्या हम...
सोच सोच विस्मित है,
अपरिचय का तम....
कैसे जुड़ जाते हैं न मन!


कितना लिखना है,
कितना लिख गयी...
और जाने
क्या क्या लिखेगी...

ज़िन्दगी! तुम्हारी ही तो है न
ये कलम...!!!

12 टिप्पणियाँ:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 12 दिसंबर 2013 को 10:34 am  

क्या बात!

ajay yadav 12 दिसंबर 2013 को 10:39 am  

mn ki seemayein undefined hain ......

Mukesh Pandey 12 दिसंबर 2013 को 1:48 pm  

ज़िन्दगी! तुम्हारी ही तो है न
ये कलम...!!!

बिल्कुल सच बहुत उम्दा लिखा है :)

vibha rani Shrivastava 12 दिसंबर 2013 को 1:50 pm  

sachchi abhivyakti

Maheshwari kaneri 12 दिसंबर 2013 को 2:13 pm  

भाव पूर्ण प्रस्तुति-

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 12 दिसंबर 2013 को 2:36 pm  

उत्तम भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति...!
RECENT POST -: मजबूरी गाती है.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 12 दिसंबर 2013 को 2:37 pm  

ज़िन्दगी की कलम के लेखे को हम कब समझ पाए हैं!!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 13 दिसंबर 2013 को 1:27 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (13-12-13) को "मजबूरी गाती है" (चर्चा मंच : अंक-1460) पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

संगीता स्वरुप ( गीत ) 13 दिसंबर 2013 को 6:34 am  

खूबसूरत अभिव्यक्ति

Anita 13 दिसंबर 2013 को 8:44 am  

वाह ! बेहद खुबसूरत ख्यालात...

देवेन्द्र पाण्डेय 14 दिसंबर 2013 को 4:48 am  

:)

प्रवीण पाण्डेय 17 दिसंबर 2013 को 6:16 am  

गतिविधि पूरी, जीवन अपना,
सोना, जगना या एक सपना।

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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