तुम्हारी एक मुस्कान के लिए, किया कितना कितना इंतज़ार... और जब झलकी वो तेरे मुख पर, खिल गया मेरा उर संसार...
तुम्हारा प्रेम तुम्हारी राह का दीप बन करे रोशन हर दिशा का द्वार... तुम्हारा प्यार हमारी राह की श्रद्धा वह है हमारे हृदय का भी उद्गार...
बहुत खुशियाँ मिले तुम्हें मुस्कानों पर हो तुम्हारा सहज अधिकार... जो कहते हो सब कविता ही तो है है तुम्हारी हर बात में संग्रहणीय सार...
छलक आया जो आंसू बन कर, उन शब्दों में है अमित संसार... मोती सा सहेज लिया हमने, छलके शब्दों का पारावार...
खुश रहना हमेशा मुस्काने उगाना कि तुम्हारी ख़ुशी से जुड़ा है मेरी खुशियों का संसार... तुम्हारे हर एक आंसू मेरे हैं मेरी आँखों से ही बहने दो न ये धार...!!
पता है... रिश्ते यूँ ही खिल आते हैं अजाने अपने हो जाते है... जानते हो, पथ की अनूठी रीत है ये- जुड़ जाना... फिर मोड़ से मुड़ जाना... तब भी होना अभिन्न और अनन्य भी... सकल तर्कों के पार कुछ कहे अनकहे तथ्यों के अनुसार! जो कह दिया, मित्र! सब हैं तुम्हारे ही तो हृदय के उदगार...!!
जाने उद्गम है क्या स्रोत किधर...? कविता लुप्त काँप कर रह गए अधर... अजब बात है, हम ही मौन... हम ही मुखर... ... ...!!
6 टिप्पणियाँ:
अद्भुत ....अद्भुत ....नाम आँखों से पढ़ रही हूँ .....तुम में ईश्वर बसते हैं अनुपमा ....!!सशक्त लेखनी है तुम्हारी ...!!बहुत सुंदर रचना ....!!
जाने उद्गम है क्या
स्रोत किधर...?
कविता लुप्त
काँप कर रह गए अधर...
अजब बात है,
हम ही मौन... हम ही मुखर... ... ...!!
बहुत सुन्दर !
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हम ही मौन... हम ही मुखर.......बहुत सुंदर
जाने उद्गम है क्या
स्रोत किधर...?
कविता लुप्त
काँप कर रह गए अधर...
अजब बात है,
हम ही मौन... हम ही मुखर... ... ...!!
वाह ! बहुत गहरे भाव..स्रोत कहीं नजर नहीं आता...फिर भी उमड़ता ही जाता है जाने कहाँ से शब्दों का पारावार...
bahut hi badiya likha hai aapne..badhaai..
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बेहद गहन भाव लिये उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ....
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