अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अनवरत...!

नहीं रहता कुछ भी एक सा
सब बदल जाता है...
चाहे वो समय हो
हो मौसम
जीवन
या फिर हम


अनवरत
चलता रहता है क्रम
हमें
बांधे रखते हैं अन्यान्य भ्रम


विदा की अंतिम घड़ी तक...!
साँसों की आख़िरी कड़ी तक...!!

2 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 8 अप्रैल 2015 को 4:48 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9-4-15 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1943 में दिया जाएगा
धन्यवाद

गिरिजा कुलश्रेष्ठ 9 अप्रैल 2015 को 7:59 pm  

सच कहा अनुपमा जी , भ्रम न हों तो जीवन ज्यादा कठिन हो जाए .

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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