अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक टुकड़ा भींगे मन का...!



आपकी दो पंक्तियाँ थी न... उन दो पंक्तियों ने भी कुछ लिखवाया था कभी डेढ़ वर्ष पूर्व... सहेज लेते हैं यहाँ आज... कि जिस तरह लिखने के मौसम होते हैं वैसे ही सहेजे जाने का भी एक मौसम होता है.. जब आता है तो कितने ही टुकड़े हम निधियों की तरह संभाल कर रख पाते हैं... हमेशा के लिए... वैसे, हमेशा के लिए तो कुछ नहीं होता... पर फिर भी...


आपकी सुन्दर पंक्तियाँ ::


'खुद' सा रहा नहीं है, 'हिस्सा' होते-होते...
'किरदार' थक चला है, 'किस्सा' ढोते-ढोते... ... ... !!  --सुरेश चंद्रा


इन दो पंक्तियों के आगे जो लिखते चले गए हम उसे सहेज लेते हैं... आज... कि आज भींगा भींगा सा "अनुशील" मन पन्नों पर उतर आना चाहता है...
फिर जाने कब अवकाश मिले यूँ बिखरे शब्द समेटने का...

*** *** ***


'खुद' सा रहा नहीं है, 'हिस्सा' होते-होते...
'किरदार' थक चला है, 'किस्सा' ढोते-ढोते... ... ... !!


जीवन जाने क्यूँ रह जाता है, हर बार जीवन होते होते
पूछती हैं नम आँखें, बड़ी उम्मीद से यह बात रोते रोते... ... ... !!


आप  कहते तो हम साथ हो लेते
आपने कहा नहीं और हम संकोचवश, रह गए साथ होते होते... ... ... !!


बहुत अँधेरा है कहीं कोई किरण नहीं
भोर का इंतज़ार किया हमने खुली आँखों से, मन में सपने बोते बोते... ... ... !!


स्वप्न से वास्तविकता तक के सफ़र की राह रोशन हो
क्यूँ रह जाता है सपना, सपना ही... वास्तविकता के धरातल का कमल होते होते... ... ... !!


'खुद' सा रहा नहीं है, 'हिस्सा' होते-होते...
'किरदार' थक चला है, 'किस्सा' ढोते-ढोते... ... ... !!

1 टिप्पणियाँ:

Onkar 12 अप्रैल 2015 को 12:45 pm  

बहुत सुन्दर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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