अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

राह निकलती है...!

हमारे आगे लम्बी राह होती है...
राह में कितने ही मोड़...
और हर मोड़ पर
अनिश्चितता...


शिथिल हो जाते हैं मन प्राण
हृदय से आह निकलती है 


अनिश्चितताओं के बीच से ही
फिर एक राह निकलती है...!

1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 13 अप्रैल 2015 को 9:22 am  

बैसाखी और अम्बेदकर जयन्ती की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार (14-04-2015) को "सब से सुंदर क्या है जग में" {चर्चा - 1947} पर भी होगी!
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ