हमने जीवन भर पुराने सिक्के जमा किये, उनकी खनक ने आबाद रखा सूनापन... शब्दों की खनक तो कुछ थी पर वैसी नहीं, हां! तुमने गुना उन्हें तो बिसर गया बेगानापन...
कहते रहना सुनते रहना मौन ही मौन सब गुनते रहना
पुराने सिक्कों की अनूठी खनक सी कोई खनक मेरे शब्दों को भी मिल जाएगी... गुन लेगा तुझ सा संवेदनशील मन उन्हें बस फिर क्या... शब्द सरिता खिल जाएगी... ... ... !!
लिखते भले हम अपनी ही संतुष्टि के लिए हों, अपने आप को ही समझाने के लिए हों, पर कोई और भी शब्दों की आत्मा तक पहुँच जाए तो इससे अच्छा क्या हो सकता है... किसी भी लिखने वाले के लिए! जो कहा जाए वो बात समझ ली जाए वैसे ही... ऐसा बहुत कम होता है न...!
दो पंक्तियों का जादू था जिसने कभी ये लिखवाया होगा... उन पंक्तियों को भी सहेज लेते हैं यहाँ कि प्रेरणा के बिना सृजन कहाँ संभव है... प्रेरणा है तो सम्भावना है... सम्भावना है, तो सृजन है -- संभावनाओं का सृजन... सृजन की सम्भावना !!!
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उस वक़्त के सिक्कों में, 'खनक है अलग' सी... ... उन सदियों में, 'मिलावट' नहीं थी... ... ... !!
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