अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बस इतना ही...!


बस
इतना ही... 


कि जब लगे
दूर बहुत हैं...


समूचे आकाश सा
विस्तृत हो
टीस जगाये कोई "काश"


तो,
अपनी आँखें मूँद कर
नमी महसूसना 


और जो कुछ आंसू हों
उनमें ढलकता हुआ हमें पा लेना...! 



भाव भाषा में वहीँ 

तुम्हारी कलम
उकेर रही होगी हमें...


करना क्या फिर...


शब्द शब्द में ढाल कर
हृदय से हमें लगा लेना...!!



और जो कुछ आंसू हों
उनमें ढलकता हुआ हमें पा लेना...!!!

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इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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