अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सम्बद्ध... असम्बद्ध... कुछ टुकड़े... यूँ ही...!

एक दिन
फुर्सत से

सारे शब्द समेटेंगे...

कविता के आँगन में
विचरेंगे...

अभी बड़ा बोझिल है मन
रो रहा है जाने क्यूँ उपवन...!!

*** 

अजाने दुखों की
गली में
भटकते हुए...


जो भी चुना
सब फूल हो गए...


यूँ पावन हुए हम
कि चरणों तले की
धूल हो गए...!


अब बस वहीँ रजकणों से वास्ता है...
आगे बड़ा लम्बा रास्ता है... ... ... !!

***

जो खींचते थे हम


आड़ी तिरछी लकीरें
वो भी खो गयी हैं...


जाने कहाँ गए शब्द
कविता मूक हो गयी है...


बस चुप हो जाने का मन है...
खो जाने का मौसम है...

जाने क्यूँ रात से ही आँखें नम हैं...!



6 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 23 अप्रैल 2015 को 7:41 am  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (24.04.2015) को "आँखों की भाषा" (चर्चा अंक-1955)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

ऋता शेखर मधु 23 अप्रैल 2015 को 12:59 pm  

वाह, शानदार रचना|

dj 23 अप्रैल 2015 को 2:51 pm  

भावपूर्ण रचना।

अभिषेक आर्जव 24 अप्रैल 2015 को 8:00 am  

सुन्दर अभिव्यक्ति!

वाणी गीत 25 अप्रैल 2015 को 4:50 am  

कोई कोई मौसम ऐसा भी हो जाता है!!
स्तब्ध मौन!

मन के - मनके 25 अप्रैल 2015 को 11:43 am  

रो रही हूं मैं---सुन रहा तू---
कभी-कभी शब्द भी मूक हो जाते है,
भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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