अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बीते वर्षों में लिखा गया कुछ... एक अनगढ़ सा ड्राफ्ट!

मेरे साथ रहना आसान तो नहीं ही होगा... यूँ अजाने दुखों से... अकारण ही दुखी... रोती हुई... लिखती हुई... चोट खाती हुई... गिरती पड़ती हुई... लोगों को सरल सहज समझ लेने की भूल बार बार करती हुई... और आहत हो कर बार बार... हर बार... स्वयं परेशान हो कर अपने स्वामी को भी कष्ट देती हुई... मैं...
अपने आप को छोड़ पाने का विकल्प होता न तो कहीं छोड़ ही आती हमेशा हमेशा के लिए... इस संसार में रहने लायक इम्युनिटी है ही नहीं मुझमें... तो बेवजह कष्टों से घिरना ही है मुझे और जो मैं दुखी रहूँ... तो मेरे साथ होने वाले की स्थिति भी तो वैसी ही होनी है...
कई बार मन होता है... पूछूँ आपसे कैसे झेल लेते हैं आप मुझे... पर पूछती नहीं... पूछूँ भी तो पता ही है क्या उत्तर मिलेगा... वही सौम्य सी मुस्कान वही धैर्यपूर्ण व्यवहार जो मेरी समस्त समस्यायों को हर लेने की पूरी क्षमता रखता है...!
अभी तो बीती है कुछ समय पहले नवम्बर की पच्चीस तारीख... हम बैठे हिसाब लगा रहे थे न... कि कितना वक़्त हो गया साथ चलते हुए... विवाह की पांचवीं वर्षगाँठ पर जब पन्ने पलटते हुए मैंने वो कविता याद दिलाई आपको तो कितने ही पल हमारी आँखों के समक्ष चलचित्र की तरह घूम गए न...
घर को दूर से देखते हुए हम दोनों की ही आँखें नम हुई और मम्मी ने जब फ़ोन पर कुछ मीठा बना कर खा लेने की बात कही... तो उनकी इसी बात में हम दोनों ने सारी मिठास बटोर ली न...
आज ये वर्ष अपनी अंतिम तारीख तक की यात्रा तय कर चुका है... कुछ समय में विदा हो जाएगा २०१३... क्यूँ न कुछ नए संकल्प लें... आज तो खिड़की से थोड़ी लालिमा भी दिख रही है दूर अम्बर पर... शायद आज सूर्योदय हो...
और हाँ, शायद हम भी सुधर जाएँ... मुस्कुराएं... नए वर्ष में आपकी यह उम्मीद फलित हो, स्वामी! और क्या कहें...


नेह का ऐसा स्वरुप
शायद ही होता होगा...!
इतना सरल...
इतना सहज...
शायद ही कोई होता होगा...!!


कई जन्मों का पून्य प्रताप होगा
जो आप हमें मिले...
हमारे जीवन में
स्नेह पुष्प से खिले...


आपकी चरणवंदना करते हुए
बीते जीवन...
आँखें नम हो जाती हैं...
इतना भी सहज होता है कोई मन!!!

2 टिप्पणियाँ:

Anita 30 अप्रैल 2015 को 10:54 am  

नेह पुष्प ही जीवन के पथ में सुगंध बन कर साथ रहते हैं...बना रहे ऐसा ही विश्वास और प्रेम... शुभकामनायें..

dj 30 अप्रैल 2015 को 6:41 pm  

मेरे साथ रहना आसान तो नहीं ही होगा... यूँ अजाने दुखों से... अकारण ही दुखी... रोती हुई... लिखती हुई... चोट खाती हुई... गिरती पड़ती हुई... लोगों को सरल सहज समझ लेने की भूल बार बार करती हुई... और आहत हो कर बार बार... हर बार... स्वयं परेशान हो कर अपने स्वामी को भी कष्ट देती हुई... मैं...
अपने आप को छोड़ पाने का विकल्प होता न तो कहीं छोड़ ही आती हमेशा हमेशा के लिए... इस संसार में रहने लायक इम्युनिटी है ही नहीं मुझमें... तो बेवजह कष्टों से घिरना ही है मुझे और जो मैं दुखी रहूँ... तो मेरे साथ होने वाले की स्थिति भी तो वैसी ही होनी है...
कई बार मन होता है... पूछूँ आपसे कैसे झेल लेते हैं आप मुझे... पर पूछती नहीं... पूछूँ भी तो पता ही है क्या उत्तर मिलेगा... वही सौम्य सी मुस्कान वही धैर्यपूर्ण व्यवहार जो मेरी समस्त समस्यायों को हर लेने की पूरी क्षमता रखता है...!
उपरोक्त पंक्तियाँ पढ़कर लगा जैसे मेरी ही कथा लिख दी है आपने
आपका ये लेख और वो कविता (ज़िन्दगी दूर बहुत ले आई है घर से!)
दोनों ही भावों से परिपूर्ण अभिव्यक्तियाँ।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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