अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता के आँगन में...!

कैसे शुरू करें... कहाँ से शुरू करें... कौन सा सिरा पकड़ कर कौन से कोने तक पहुंचे... क्या करें...? फिर सोचा, थोड़ा रो लिया जाये... आंसुओं से लिखेंगे...! जो लिखेंगे आंसू... वही अंकित हो जायेगा यहाँ...! हम आंसुओं को कलम थमाए खुद को पीछे खींच ले रहे हैं... कि ऐसे भी लिखते वक़्त लिखने वाला वही होता है जो कलम उसे होने देना चाहती है... हमारा अपना आप तो बहुत पीछे रह जाता है... कोई विराट दुःख की रागिनी होती है... किसी सुख की भूली बिसरी कोई धुन होती है... जो स्याही से निकलती है... और रच जाता है एक संसार... हमेशा के लिए सहेजे जाने को तैयार... तत्पर! 

पिछले वर्ष घर गए थे... भारत... अपनी छोटी बहन के विवाह पर... बस कुछ ही दिनों के लिए... अभी उस समय की तस्वीरें देखते हुए पुनः जी रहे थे वही सब क्षण... अब सोच रहे हैं लिख जायें पिछली यात्रा के हर लम्हे को और जी लें पुनः अपने अपनों के बीच होने का एहसास...! 

एकदम शुरू से शुरू करते हैं... १६ जनवरी २०१४ को निकले थे हम लोग भारत के लिए... बीच में इस्ताम्बुल शहर में रुकना हुआ कनेक्टिंग फ्लाइट के लिए... इस बीच शहर घूमने का आप्शन था... और खूब घूमे हम शहर... लेकिन आज इस्ताम्बुल के बारे में नहीं... वह फिर कभी! अभी हम १८ की सुबह की दहलीज़ पर ला रखें हैं मन को... जब फ्लाइट इंडिया लैंड हुई थी... 

बेहद ख़ास थी वह सुबह... बहुत समय बाद हम भारत भूमि पर थे... बहुत दिन बाद घर लौटने के एहसास को महसूस किया था... और इसलिए भी बेहद ख़ास था वह लम्हा कि कोई अनजाना सा बेहद ख़ास... बिलकुल अपना कोई... एअरपोर्ट पर हमारा इंतज़ार कर रहा था...! हम बाहर निकलते हुए ये नहीं जानते थे कि अनन्यता की झलक पाकर हम भावविभोर हो जाने वाले हैं... पहली बार देखते मिलते हुए भी ऐसा नहीं लगा जैसे पहली बार मिले हों... हमें अनामिका के यहाँ ड्राप करते हुए चले गए वो... बस कुछ ही क्षण थे... आत्मीयता के कुछ ही पल थे जो हमने साथ बिताये... आशा थी... विश्वास था... कि पुनः मिल पायेंगे... लेकिन फिर उनकी जो व्यस्तता रही कि मिलना तो दूर की बात फ़ोन पर भी संपर्क संभव नहीं हो पाया...! हम लोग २ फ़रवरी को वापस आ गए स्टॉकहोम ... आने से पूर्व पुनः एक बार न मिल पाने की टीस लिए... और फिर व्यस्तता ऐसी रही कि टूटा रहा संपर्क... लेकिन आज जब यह सब लिख रहे हैं करीब वर्ष भर से ऊपर बीत चुके समय के उपरान्त तब यह अनुभूति मन भिगोये हुए है कि प्रगाढ़ता समय के अंतराल से कम नहीं होती... बल्कि बढती ही है... अनन्य से अनन्यतम हो जाता है कोई अनायास ही... बिना किसी लम्बी पहचान के... 

... और कैसे नहीं है लम्बी पहचान... कितने लम्बे समय से तो जुड़े रहे हैं शब्दों से फ़ेसबुक पर... २०१० से शब्दों का यह संपर्क रहा ही तो है... आज भी अनुशील के पहले पन्ने पलटें तो वहाँ भी आहटें दर्ज हैं... कि हम शब्दों के माध्यम से जुड़े रहे हैं लम्बे समय से... और सिर्फ इतना ही क्यूँ... सदियों के रिश्ते होंगे... कौन जाने! कविताओं का... अक्षर का... ईश्वर का ... अस्तित्व तो हमारी कल्पना से परे की चीज़ है न... हम उतना ही जानते हैं जितना देखते हैं... पूर्वनिर्धारित घटनाक्रमों का आकाश हमारे लिए अनजाना होता है... कौन जाने शब्द शब्द लिखते हुए सदियों से हम साथ हों...! मिले भी तो यूँ अचानक स्वप्न की तरह बस एक झलक भर के लिए... कोई विशेष बातचीत भी नहीं... समय जो नहीं था... फिर वापस मिलना भी नहीं हुआ और एक लम्बे अंतराल के लिए कोई विशेष संपर्क भी नहीं रहा... फ़ेसबुक पर आना जो छूटा हुआ था मेरा... आज जब यहाँ हैं, उन लम्हों को याद कर रहे हैं... और अनुशील पर लिख रहे है तो यही सोच रहे हैं कि क्या आपको याद होगी वो मुलाक़ात... वो थोड़े से पल जब हम साथ थे... अगर विस्मृत हो गया हो तो दो एक तस्वीरें हैं उन्हें साझा कर रहे हैं... मन के कैनवास पर तो ढ़ेरों विम्ब हैं उन पलों के... ठीक ठीक उतने ही विम्ब जितने कि कविताओं में होते हैं या हो सकते हैं... है न, प्रिय कवि! पहचानिए तो यह स्वप्न जैसा कुछ घटित हुआ था वास्तव में या भ्रम ही है कोई... 


तस्वीर आश्वस्त करती हुई कहती है... हाँ मिले थे, फिर मिलेंगे...! कविता के आँगन में परिचय के अनगिन पुष्प खिले हैं... और खिलते ही रहेंगे... समय की गति नहीं लील पायेगी कुछ भी... इतने लम्बे अंतराल के बाद भी सब यथावत ही है न... कविता... कविताओं का आना जाना... उनका अविरल गति से हमारे बीच बहना... बने रहना...!!! लिखने को बहुत कुछ है लिखते ही चले जायेंगे पर अब रुकते हैं... नम आँखों से निवेदित है प्रणाम... स्वीकार करना कवि!

अंत में आपकी ही पंक्तियाँ दोहराए लेते हैं...

'आँसू' के बहाने हैं, 'सपने' मनमाने हैं...
आँखों की डिबिया मे, कितने खजाने हैं... ... ... !! 

4 टिप्पणियाँ:

Udaya 15 अप्रैल 2015 को 6:52 am  

कुछ संस्मरण अपनी प्रतिध्वनि से मन में विचरते रहते हैं।

Ashok Saluja 15 अप्रैल 2015 को 8:38 am  

आप दोनों धनी है ,,अपने अपने अनमोल खजाने से ,,,,,एक कलम से अपने ज़स्बात लिखता है ...दूसरा अपने दिल के ज़स्बात लिखता है ...अब मैं किस किस की सुनूँ ....एक चन्द्र है और दूसरी अनु ??

Dilbag Virk 15 अप्रैल 2015 को 4:57 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 16-4-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1948 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Madan Saxena 17 अप्रैल 2015 को 7:43 am  

सुन्दर

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ