अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कौन जाने किस ठौर...!


कुछ कदम साथ चले...
फिर चल दे कहीं और,
कौन जाने किस ठौर...!


बहुत कुछ है जो समझ से परे है...
कब मिल जाए कब खो जाये,
अपना सा ही कोई और...!


जाने कैसा है यह जीवन पथ...
दूर से दीखता कुछ है,
जो पास जाओ तो है कुछ और...!


2 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 11 अप्रैल 2015 को 12:14 pm  

हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल रविवार (12-04-2015) को "झिलमिल करतीं सूर्य रश्मियाँ.." {चर्चा - 1945} पर भी होगी!
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kailash Sharma 12 अप्रैल 2015 को 11:02 am  

यही शायद जीवन यात्रा है...बहुत सुन्दर और गहन प्रस्तुति...

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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