अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मिलते रहना यदा-कदा...!

जाने कैसे
कहाँ से
तू मुझे मिली...


जीवन की धूप में !


जैसे
अगरबत्ती, धूप, दिया सा...
कोई मिल गया हो...


कब से मुरझाई धरती पर
एक फूल आस्था का खिल गया हो...


हृदय में बसी प्रार्थना हो गयी तुम...
कविते! तुममें घुलकर भली सी लगने लगी जीवन की धुन...


ये सब ऐसा ही रहे सदा...
मिलते रहना यदा-कदा... !!

4 टिप्पणियाँ:

Onkar 25 अप्रैल 2015 को 7:17 am  

बहुत खूबसूरत रचना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 25 अप्रैल 2015 को 2:04 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-04-2015) को "नासमझी के कारण ही किस्मत जाती फूट" (चर्चा अंक-1957) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

dj 25 अप्रैल 2015 को 7:10 pm  

आपका आना और अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया व्यक्त करना बहुत सुखद लगा। बहुत बहुत आभार "अनु जी ":)

रचना दीक्षित 26 अप्रैल 2015 को 4:51 pm  

बेहतरीन प्रस्तुति

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आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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