अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मिलते रहना यदा-कदा...!

मन की गति... मन ही जाने... कैसे तो तुमसे जुड़ गया... शब्दों और कविताओं ने वो पुल बुना कि उन्हें बार बार पार करते हुए हम इतने अभिन्न हो गए... जैसे सदियों से परिचय रहा हो... हमेशा से साथ हों... जाने कितनी ही सदियाँ देखीं हों हमने एक संग... जाने कितने ही आंसू रोये हों हमने एक साथ... कितने ही सूर्योदय और सूर्यास्त के साक्षी रहे हों हम... न भी हो तो क्या... ये बस भावातिरेक में कहे गए... महसूस  किये गए मात्र भाव ही हों शायद...पर इस सम्भावना से इनकार भी नहीं कि जो भटकते हुए मिल गए कहीं... धरती के किसी कोने पर... तो पल भर में ही सदियों का साथ जी लेंगे हम... मन से मन के रिश्ते का फ़लक बहुत विशाल होता है... यहाँ तर्क के लिए जगह नहीं कोई... बस महसूसना है... मौन में... और उसी मौन में... जी लेना है एक सम्पूर्ण जीवन...!


जाने कैसे
कहाँ से मिले
आप हमें...


जीवन की धूप में... 


जैसे
अगरबत्ती... धूप... दिया सा...
कोई मिल गया हो...


कब से मुरझाई धरती पर
एक फूल आस्था का खिल गया हो...


हृदय में बसी प्रार्थना हो गए आप...
भली सी लगने लगी जीवन की हर थाप...


ये सब ऐसा ही रहे सदा...
मिलते रहना यदा-कदा... ... ... !!


*** *** ***


आंसुओं से लिखते हैं जब भी आपके लिए या आपको लिखते हैं...
स्याही नहीं लिख पाती आपकी उज्ज्वलता तो हम ओस और आंसू चुन कर लिखते हैं... हाथ जल जाता है... कट जाता है... नीले निशान पड़े होते हैं चोट के... जो इधर उधर गिरते पड़ते हम लगाते रहते हैं... पर आपकी स्निग्ध उपस्थिति सारे कष्ट हर लेती है...

आप जाने कौन सा
"काश" हो...

कौन सा
समूचा आकाश हो...!

जो भी हो...

ऐसे ही रहना...
सदा सर्वदा... !!


*** *** ***


अनुपमा बहुत बड़ा नाम है न... अब तक का अनुभव कहता है... यहाँ स्टॉकहोम में नाम को छोटा कर के पुकारने का चलन है... जो बोलने में सहूलियत हो... वही बोलते हैं लोग... अब "पुकारू" नाम का चलन तो हमारे यहाँ भी है ही न... 
जैसे नाम है Charlotta तो पुकारा जाएगा केवल Lotta... :) यहाँ के लिए तो हमारा नाम भी अलग सा ही है... पता  नहीं क्या क्या उच्चारण करते हैं सब... अब तो हम भी अपने आप को अनुपामा ही कहने लगे हैं... आना... ऐना... ओबामा... अनुपुना... अनापुना... और न जाने क्या क्या सुनने को मिलता है...:) अच्छा लगता है अब किसी भी तरह से पुकारा जाना... बस समझ में आ जाये कि अपने को ही पुकारा जा रहा बस काफी है रेस्पोंड करने के लिए... और क्या...!
अनु... इस तरह तो पुकारे जाते ही रहे हैं... स्कूल के कुछ मित्रों द्वारा... कभी कभार...! ससुराल में सब अनु ही कहते हैं... छोटी सी अनु... अपने नाम जैसी...
अनुपमा सचमुच बहुत बड़ा नाम है... अर्थ की दृष्टि से भी... उपमा से परे होना बहुत बड़ी बात है न... इतने बड़े तो कभी हो भी नहीं सकते हम...
आप जब अनु कहते हैं... सच बहुत अच्छा लगता है... अपनेपन की डोर का आभास भला लगता है... लेकिन फिर अनुपमा जी कह कर दूर भी कर देते हैं कई बार... ध्यान रखियेगा... पहुंचे मेरी बात आपतक और अनु... अनु ही रहे... अनुपमा जी न हो जाये... बस ऐसे ही अनुशील पर... अरे... अनुशील में भी तो केवल अनु ही है न... वाह!!!
हाँ तो कह रहे थे बस ऐसे ही अनुशील पर यह लिख आपतक पहुंचानी थी यह बात कि अनु होकर अनुपमा खुश है... थैंक्स फॉर एवरीथिंग...

*** *** ***

Dearest Mummy,

Lovely is lost... Lovely misses being called lovely... All those special people for whom I was... I am lovely... are all so far away from me... I feel lost... I miss you all... I miss me...


बस लगता है
भूल जायेंगे अपने इस बचपन के नाम को...

इसलिए...

बस ऐसे ही...
अकारण...
याद करते हुए...
याद आते हुए...

सहेज रहे हैं... कुछ शब्द
और अपना सुबकता मन...!

5 टिप्पणियाँ:

Onkar 25 अप्रैल 2015 को 7:17 am  

बहुत खूबसूरत रचना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 25 अप्रैल 2015 को 2:04 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-04-2015) को "नासमझी के कारण ही किस्मत जाती फूट" (चर्चा अंक-1957) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

dj 25 अप्रैल 2015 को 4:28 pm  

बहुत बढ़िया। अनु जी।
"अनु कहते हैं... सच बहुत अच्छा लगता है... अपनेपन की डोर का आभास भला लगता है... लेकिन फिर अनुपमा जी कह कर दूर भी कर देते हैं कई बार... ध्यान रखियेगा... पहुंचे मेरी बात आपतक और अनु... अनु ही रहे... अनुपमा जी न हो जाये...."
अनुपमा जी , अनु जी तो हो ही सकतीं हैं न। निश्चिन्त रहिये दूर होने का तो प्रश्न नहीं। आपकी शानदार रचनाएँ पढ़ने का उत्साह किसी को आपसे दूर होने ही न देगा।संयोग ही है की मेरी अनुजा का नाम भी अनुपमा है और उसे भी आपकी भांति अनु कहलाना भाता है।

dj 25 अप्रैल 2015 को 7:10 pm  

आपका आना और अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया व्यक्त करना बहुत सुखद लगा। बहुत बहुत आभार "अनु जी ":)

रचना दीक्षित 26 अप्रैल 2015 को 4:51 pm  

बेहतरीन प्रस्तुति

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