अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

शोभा, तुम्हारे लिए!

आदर्श की मशाल लिए
बढ़ने वाला सत्य हो,
जीवन ऐसा हो जैसे
उगते सूर्य को
गंगाजल का अर्घ्य हो...!


कितने मोड़ आते हैं
आयेंगे ज़िन्दगी में,
हर मोड़ पर
आत्मा में
आनंद का ही पर्व हो...!


खिलते फूलों को
काटों से इनकार न हो,
और काटों को
फूलों के
खिल आने पर गर्व हो...! 


ये दिन बार बार आये
लेकर शुभ संकल्प जीवन में,
दोस्त! हर जन्मदिवस तुम्हारा
उत्सव हो जीवन का
उल्लास का ही पर्व हो...!


जीवन ऐसा हो जैसे
उगते सूर्य को
गंगाजल का अर्घ्य हो...!!!

*** *** ***

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाले दिन याद आते हैं... हॉस्टल की चहल पहल याद आती है... मित्रता की मिशालें याद आती हैं... इस प्रतिपल बीतते जीवन में उन लम्हों की विशिष्टता सदा आकृष्ट करती है... ये हमारा सौभाग्य है कि एक दूसरे से जुड़े रहकर हम आजीवन उन लम्हों से जुड़े रह सकते हैं... जो उस देवनगरी में हमने जिया...!
पुनः जन्मदिन की खूब सारी शुभकामनाएं तुम्हें... प्रिय शोभा! 

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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