एक बात अक्सर होती है, हम यूँ ही रो रहे होते हैं... कभी कुछ तो कुछ बात को लेकर, ज्यादातर बिना किसी कारण के भी! ऐसे में सुशील जी का पूछना कि "क्या हुआ... क्यूँ रो रही हो", और रुलाता है... मेरे पास क्यूँ का कोई जवाब जो नहीं होता...! एक ही जवाब देते हैं हम, आज से नहीं बहुत पहले से, मम्मी भी पूछती थी तो यही कहते थे... "ऐसे ही रो रहे हैं", "मन है रोने का तो रो रहे हैं". अब ये जवाब सुन कर तो किसी का भी नाराज़ होना स्वाभाविक ही है... तो ऐसा होता रहता है!
कुछ दिन पहले हमने अपना प्रस्ताव पारित करवा ही लिया इनसे कि मेरा जब मन होगा रोयेंगे, बिना रोक टोक रोने की सहूलियत तो हमको मिलनी ही चाहिए...! क्या करते मेरे स्वामी "न-हाँ" करते हुए मान गए...!
कल जब रोये हम यूँ ही, तो चुप कराने ही वाले थे कि उन्हें हमारी "डील" याद हो आई... तो हमें रोने दिया गया...
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आज सुबह "कविता जैसा कुछ" लिख गयी कलम यूँ ही, जैसे यूँ ही रोते हैं हम...!
आँखें तो ख़ुशी में भी नम होती हैं न...
कुछ दिन पहले हमने अपना प्रस्ताव पारित करवा ही लिया इनसे कि मेरा जब मन होगा रोयेंगे, बिना रोक टोक रोने की सहूलियत तो हमको मिलनी ही चाहिए...! क्या करते मेरे स्वामी "न-हाँ" करते हुए मान गए...!
आँखें तो ख़ुशी में भी नम होती हैं न...

6 टिप्पणियाँ:
badi khoobsurti ke sath apni baat rakhi hain anupma jee .........
जैसे ...सफाई के लिए शीशे पे कपड़ा...दिल के लिए रोना .......ज़रूरी है ???
खुल के रोने से, दिल का शीशा साफ़ हो जाए
बाद बारिश के, जैसे खुबसूरत आकाश हो जाए ....
--अशोक'अकेला'
खुश रहें ...खुबसूरत ज़स्बात |
my mother once wrote a poem, which went like- "I close my eyes and tears start rolling out..."
ये आंसू कुछ होते ही ऐसे हैं...खुशी हो या गम आ ही जाते हैं बिन बुलाये...कभी यूँ ही दिल चाहता है रोना बिना किसी वज़ह के..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...
बहुत खूब
सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
शुभकामनाएँ।
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