अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हमें रोने देना...!

एक बात अक्सर होती है, हम यूँ ही रो रहे होते हैं... कभी कुछ तो कुछ बात को लेकर, ज्यादातर बिना किसी कारण के भी! ऐसे में सुशील जी का पूछना कि "क्या हुआ... क्यूँ रो रही हो", और रुलाता है... मेरे पास क्यूँ का कोई जवाब जो नहीं होता...! एक ही जवाब देते हैं हम, आज से नहीं बहुत पहले से, मम्मी भी पूछती थी तो यही कहते थे... "ऐसे ही रो रहे हैं", "मन है रोने का तो रो रहे हैं". अब ये जवाब सुन कर तो किसी का भी नाराज़ होना स्वाभाविक ही है... तो ऐसा होता रहता है!
कुछ दिन पहले हमने अपना प्रस्ताव पारित करवा ही लिया इनसे कि मेरा जब मन होगा रोयेंगे, बिना रोक टोक रोने की सहूलियत तो हमको मिलनी ही चाहिए...! क्या करते मेरे स्वामी "न-हाँ" करते हुए मान गए...!
कल जब रोये हम यूँ ही, तो चुप कराने ही वाले थे कि उन्हें हमारी "डील" याद हो आई... तो हमें रोने दिया गया... 
***
आज सुबह "कविता जैसा कुछ" लिख गयी कलम यूँ ही, जैसे यूँ ही रोते हैं हम...!
आँखें तो ख़ुशी में भी नम होती हैं न...


रो पड़े आँख जो
तो नम होने देना,
जब रोना चाहें हम
हमें रोने देना! 


कारण पूछोगे...
कह नहीं पायेंगे,
बिन मौसम की रिमझिम का...
भला हम क्या कारण बतलायेंगे?


कहीं 

अपना सा कुछ 

दिख जाता है...
आँखें भर आती हैं,
जीवन की राहों में...
अश्रुबून्दों के साथ 

कुछ ओस की बूंदें भी 

मुस्काती हैं! 


कल जब किसी ने बुरा कहा था

जी भर कर थे रोये हम,

आज जब किसी ने मान दिया  

आँख फिर भर आयी!
पहले ने रस्ते का था पता दिया,

दूजे से मिला 

चलते रहने का हौसला 

तो आँख फिर डबडबायी! 


हम गाहे-बगाहे 

ऐसे-वैसे

जब-तब
खूब रोते हैं...
आंसू 

मेरे अपने हैं
वो सदा 

साथ मेरे होते हैं... 


तुमसे हमें 

प्यार बहुत है
मेरे हमसफ़र!
तुम्हारे होने से 

हर क्षण
ख़ुशी की है एक लहर!

पर,
आंसू भी
हमको प्यारे हैं...
हम
अपनी समस्त खामियों संग
तुम्हारे हैं...

कुछ मांगे तुमसे आज
तो, दोगे न?
आंसुओं संग हमें पाया तो
पागल नहीं कहोगे न? 


देखो, बस इतना
होने देना...
जब रोना चाहें हम
हमें रोने देना! 

6 टिप्पणियाँ:

mridula pradhan 11 अप्रैल 2015 को 9:27 am  

badi khoobsurti ke sath apni baat rakhi hain anupma jee .........

Ashok Saluja 11 अप्रैल 2015 को 10:11 am  

जैसे ...सफाई के लिए शीशे पे कपड़ा...दिल के लिए रोना .......ज़रूरी है ???
खुल के रोने से, दिल का शीशा साफ़ हो जाए
बाद बारिश के, जैसे खुबसूरत आकाश हो जाए ....
--अशोक'अकेला'
खुश रहें ...खुबसूरत ज़स्बात |

Dinesh Srivastava 11 अप्रैल 2015 को 1:45 pm  

my mother once wrote a poem, which went like- "I close my eyes and tears start rolling out..."

Kailash Sharma 11 अप्रैल 2015 को 4:11 pm  

ये आंसू कुछ होते ही ऐसे हैं...खुशी हो या गम आ ही जाते हैं बिन बुलाये...कभी यूँ ही दिल चाहता है रोना बिना किसी वज़ह के..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

Onkar 11 अप्रैल 2015 को 4:30 pm  

बहुत खूब

Sanju 11 अप्रैल 2015 को 6:49 pm  

सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
शुभकामनाएँ।

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