अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सब समेटे अंतस में...!

एक बित्ता अम्बर
और मुट्ठी भर धरा...
दौड़ती हुई ज़िन्दगी के हिस्से आया
हर घाव रहा हरा...


कितनी बार टूटा सपना
कितनी बार रूठा कोई अपना
कितने ही जगमग तारे टूटे
कितने लम्हे पीछे छूटे


सब समेटे अंतस में
सदा जीवन राग रहा खरा...


नीरव निस्तेज विकल समय में भी
गुनगुनाते रहे अविराम
अम्बर और धरा...!

4 टिप्पणियाँ:

abhi 6 अप्रैल 2015 को 5:40 am  

True..!

राजीव कुमार झा 6 अप्रैल 2015 को 6:13 am  

बहुत सुंदर और भावपूर्ण.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 6 अप्रैल 2015 को 1:26 pm  

हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार (07-04-2015) को "पब्लिक स्कूलों में क्रंदन करती हिन्दी" { चर्चा - 1940 } पर भी होगी!
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) 7 अप्रैल 2015 को 9:49 am  

बहुत सुंदर

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ