अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यूँ ही कुछ टुकड़े... कुछ विचार...!

भले नयी लिपियाँ सीख जाएँ
पारंगत हो जाएँ किसी विदेशी भाषा में
लेकिन जब सोचेंगे
तो जिस भाषा में प्रस्फुटित होंगे विचार
वो शर्तिया अपनी होगी

*****

लिखेंगे जब किसी अन्य भाषा में
तो वही अपनी भाषा में सोचा गया विचार
अनूदित होगा

और अपनी भाषा की ज़मीन से उठ कर अनूदित होते हुए
कुछ एक आवश्यक अंश
अवश्य खो चुका होगा

*****

मन के पृष्ठों से
कागज़ तक आते आते
कितना कुछ है... जो छूट जाता है
शब्दों की ऊँगली थामते ही
सादा सा कोई सच
सदा के लिए रूठ जाता है

*****

विचार की भाषा है यदि सादापन
तो उसे रंगों में परिवर्तित न किया जाए
जो भी भाषा हो मन की
वह स्वाभाविकता से व्यक्त हो जाए



1 टिप्पणियाँ:

Yashwant Yash 20 अप्रैल 2015 को 6:21 am  

" लिखेंगे जब किसी अन्य भाषा में
तो वही अपनी भाषा में सोचा गया विचार
अनूदित होगा
और अपनी भाषा की ज़मीन से उठ कर अनूदित होते हुए
कुछ एक आवश्यक अंश
अवश्य खो चुका होगा"
.
पूरी तरह सहमत।

सादर

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ