अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सुरेश जी, आपके लिए...

शब्द ब्रह्म होते हैं... तभी तो कैसे अनजाने लोग... सिर्फ शब्दों के माध्यम से इतनी गहरी डोर में बंध जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कभी वो समय भी रहा होगा जब पहचान नहीं रही होगी... एक ही मंदिर की सीढ़ियों पर शीश नवाने वालों के बीच प्रगाढ़ रिश्ता बन ही जाता है न... हम सब शब्द जीते हैं... भाव जीते हैं... व्यक्त करते हैं... एक दूसरे की सुनते हैं... एक दूसरे को गुनते हैं... और जुड़ जाते हैं अभिन्नता से...! कविता जोड़ती रही है... हमेशा जोड़ेगी... और हमारी यात्रा का आयाम बन कर सदा मुस्कुरायेगी... कि... कई ऐसे पल होते हैं, जब मृत्युतुल्य कष्ट हम बस इसलिए सह पाते हैं, क्यूंकि हमारे पास कोई एक होता है जिसके कंधे पर सर रख कर रोया जा सके... भाव रूप में भी ये साथ बिलकुल संभव है... और यही तो करती है कविता... हमारा संबल बनती है... किसी की कलम का उद्गार हमारे लिए इतना अपना हो जाता है कि वह लिखने वाले को भी हमारा अभिन्न बना जाता है... घटित हो रही कविता कितना कुछ जोड़ती है... कितना कुछ निर्मित करती जाती है हमारे लिए... ये हमारे अनुमान से परे का विषय है...!

क्यूँ लिख रहे हैं अभी ये सब हम...?? ये सब वही अदृश्य शक्ति लिखवा रही है... जिसने हमें आपसे... आपकी कविताओं से मिलवाया... और आज वो मेरी भी अपनी है... उतनी ही जितने अपने... आप हैं... प्रिय कवि! 

आपका जन्मदिन है न आज...  क्या दें आपको उपहार हम... यही सब सोच रहे थे... तो फिर सोचा... आपके जन्मदिन पर हम स्वयं ही अपने आपको उपहार क्यूँ न दे दें...! इसलिए, लिख रहे हैं... ये सब... जाने क्या क्या... कि मेरे इस रचना संसार में अंकित हो जाये कुछ आपके लिए... आपके ही प्रताप से! मुड़ कर देखेंगे जितनी बार... उतनी बार अभिभूत होंगे... चमत्कृत होंगे... कि भावों को इतनी सिद्दत के साथ पिरोने वाले व्यक्तित्व से हमारी पहचान रही है... हम उसे अपना कहते रहे हैं... और उसके भी अपने रहे हैं... ... ... !!

कितने समय से आपको फ़ेसबुक पर पढ़ते रहे हैं... ये बात और है कि आपकी प्रोफाइल अंतर्ध्यान हो जाती रही है बीच बीच में... अभी जब हम फ़ेसबुक पर इतने दिन बाद लौटे... तो आपकी प्रोफाइल बदल चुकी थी... पर शेष कुछ नहीं बदला था... वही शब्दों एवं भावों का समंव्यय... वही आप... और सबकुछ वैसा ही...

याद है, दस जनवरी २०१४ को कुछ लिखा था आपके लिए आपकी कविताओं के लिए... फ़ेसबुक पर... आज वही भाव हम यहाँ सहेज लेते हैं पुनः... यहाँ लिख जाएगा तो खोएगा नहीं... इस सृजन संसार को ललित भैया का आशीर्वाद जो प्राप्त है...
फ़ेसबुक प्रोफाइल का क्या है... आज है शायद कल फिर बदल जाए... आज दिख रहे हैं हम वहाँ... कल शायद फिर खो जायें :) 


आपके लिए... आपकी कविताओं के लिए...!
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आपको पढ़ते हुए...
आपकी कविताओं से गुजरते हुए...
हमने जितने फूल चुने
सब मुस्कुराते हैं...


और वो रुला देने वाले गद्य,
उन्हें इतनी बार पढ़ा है
कि भीतर कहीं अंकुरित हो आया है एक बीज...
मिट्टी, नमी और खाद मिले होंगे अन्दर प्रस्तर प्राचीरों में,
तभी तो ये संभव हो पाया है...
हरापन अन्दर उग आया है... ... ...


दो पंक्तियों का चमत्कार
जिसमें निहित आत्मा की चीत्कार
सब मन में बसते हैं
सच, आंसू भी हँसते हैं 


उतनी समझ नहीं
कि मर्म सकल पढ़ पाएं...
शब्दों को जो सम्मान देती है आपकी लेखनी
कुछ वैसे ही प्रतिमान
उनके सम्मान में
शायद ही कभी हम गढ़ पाएं...


फिर भी
बस यूँ ही
आज आपके अनगिन शब्दों के लिए
अपनी टूटी फूटी भाषा में
कुछ कहने का मन है...
सच! आपकी कविता
कितने ही
मन प्राण का
कितनों के भाव संसार का
सहज दर्पण है...


अक्षर अक्षर का आपस में अनूठा प्यार है
और वहीँ से भाव सागर का विस्तार है 


यूँ ही लिखें आप
सूर्य... शशि... अम्बर...
स्वर... बांसुरी... पीताम्बर...


और रचते जाएँ
जीवन... ... ...
हे कविमना!
धन्य हैं आप... धन्य आपका कवि मन... ... ... !!


आपकी कविताओं के इस अकिंचन पाठक ने अपनी समझ से जो उकेरा है, उसे स्वीकार करना कवि!
इनमें सुशील जी की भी संवेदनाएं शामिल हैं... वो भी आपका लिखा सब सुनते हैं... हम सुनाते हैं उनको...! अनामिका को भी आपकी दो पंक्तियों का जादू बेहद पसंद है... तो मेरी इस अभिव्यक्ति में उसके भाव भी शामिल हैं...! मेरे ढ़ेर सारे दोस्त... स्कूल के समय के, बी.एच.यू के... और यहाँ स्टॉकहोम के भी दोस्त... आपकी पंक्तियों को... आपकी कविताओं को बहुत पसंद करते हैं... मेरी अभिव्यक्ति में भावरूप में वे सब भी शामिल हैं... और अंततः निश्चित ही आपके अन्य सभी पाठकों के हृदय के उद्गार भी प्रेरक रहे होंगे जो हम यह सब इतना लिख पाए...

हम सब की ओर से आपको जन्मदिन की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं... आपके सभी सपने पूरे हों... ढ़ेरों खुशियाँ मिलें... और हम सबको आपके और आपके शब्दों के सान्निध्य का सौभाग्य... और क्या चाहिए जीवन से...


Many many happy returns of the day!
Have a memorable birthday...
Choicest wishes,
Lots of love:)

6 टिप्पणियाँ:

anamika ghatak 10 अप्रैल 2015 को 9:27 am  

अति उत्तम .....अद्भुत शब्द चयन

Ashish Anshu 10 अप्रैल 2015 को 11:07 am  

दी.. आपके शब्दों का यह संसार एक अद्भुत आध्यात्मिकता का भाव पैदा करती है..।

Ashok Saluja 10 अप्रैल 2015 को 3:06 pm  

मेरी तरफ़ से भी आप को और सुरेश जी को बधाई और शुभकामनायें .......

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 10 अप्रैल 2015 को 3:33 pm  

हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (11-04-2015) को "जब पहुँचे मझधार में टूट गयी पतवार" {चर्चा - 1944} पर भी होगी!
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar 11 अप्रैल 2015 को 10:26 am  

बहुत सुन्दर

rafat alam 3 मई 2015 को 5:48 pm  

फ़ेसबुक प्रोफाइल का क्या है... आज है शायद कल फिर बदल जाए... आज दिख रहे हैं हम वहाँ... कल शायद फिर खो जायें...अपनी टूटी फूटी भाषा में
कुछ कहने का मन है...
सच! आपकी कविता
कितने ही
मन प्राण का
कितनों के भाव संसार का
सहज दर्पण है....aapka badapan..suresh ji ko maine aapke jariye jaana hardik aabhar

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