बहुत कुछ लिखा
बहुत कुछ मिटाया
वो सारे पत्र
जो नहीं भेजे गए किसी पते पर
सब जाने कैसे
पहुँच गए तुम तक
कि तुम सब जानते हो
जो भी मैंने लिखा था
यहाँ तक कि
जो लिख कर मिटाया भी
वो सब भी तुम तक यथावत पहुंचा था
जाने कैसे...?
तुम सब जानते थे...
कि शायद तुम भी वह ही कुछ जी रहे थे!
मन से
मन का जुड़ाव
जाने कैसा था...!
तुम्हारा मेरे लिए
मेरा तुम्हारे प्रति
स्नेह...
एक जैसा था...!!
ऐसे ही रहना
अनकहा भी समझना
और मुझसे जो चाहो वो कहना...!
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