अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ऐसे ही रहना...!

बहुत कुछ लिखा
बहुत कुछ मिटाया


वो सारे पत्र 

जो नहीं भेजे गए किसी पते पर
सब जाने कैसे 

पहुँच गए तुम तक


कि तुम सब जानते हो
जो भी मैंने लिखा था
यहाँ तक कि 

जो लिख कर मिटाया भी
वो सब भी तुम तक यथावत पहुंचा था


जाने कैसे...?
तुम सब जानते थे...
कि शायद तुम भी वह ही कुछ जी रहे थे!

मन से 

मन का जुड़ाव
जाने कैसा था...!
तुम्हारा मेरे लिए
मेरा तुम्हारे प्रति
स्नेह...
एक जैसा था...!!


ऐसे ही रहना
अनकहा भी समझना
और मुझसे जो चाहो वो कहना...!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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