अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

साथ रोना साथ होना ही है...!

मेरा मौन नहीं समझते तुम...
मेरे शब्द नहीं पहुँचते तुम तक...
मेरी हंसी खो जाती है बीच राह में
मेरे आंसू भी तो नहीं पहुँचते तुम तक...


कितना प्रिय है न तुम्हें अनमने रहना
और न कहते हुए ही सब कुछ कहना


देखो, तुम्हारे सारे दावे झूठे हैं
कि कुछ नहीं समझते हम
हम सब समझते हैं... और खूब समझते हैं
आखिर एक है न हमारा मन


नहीं तो अब तक कब का मुंह फेर लिया होता
आंसू न बहाए होते... दो टूक कह दिया होता
कि न करनी है तो न करो बात
हमें नहीं चाहिए तुमसे इतने आंसुओं की सौगात


पर ऐसा नहीं है न
हम वहीँ कहीं हैं न


देखो,
सारे गम में
तुम्हारे साथ हैं...
तुम्हारे आंसू न हर पाए
तो हमारी आँखें भी
नम दिन रात हैं...


साथ रोना
साथ होना ही है...
जीवन पाना तो है ही
खोना भी है...


सारे आंसू
खो देंगे...
फिर हम फिर से
एक बार रो देंगे...


ये आंसुओं का रिश्ता इतना प्रगाढ़ होगा देखना
मिट जाए बस कुछ जतन से ऐसा है यह लेख ना


फिर हम
शब्द सेतु बनायेंगे...
जिसने जोड़ा है हमें
उस कविता के समक्ष शीश नवायेंगे... ... ... !!

कविता यही तो करती आई है... यही तो रही है कविता हमेशा से मेरे लिए... बस जोड़ दिया अनायास और शब्दों का यह जुड़ाव शब्दों से परे अपनी गति स्वयं निर्दिष्ट करता रहा... ऐसा ही तो इस बार भी हुआ न... आपके शब्दों को गुनते बुनते कब हमने एक पुल बुन लिया... 
हे कविते! नमन तुम्हें.. हे कवि! धन्य आप... शब्दों का मान सम्मान और ऊँचा उठे और उससे भी ऊंचा हो भावों का आकाश...!


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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