अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

चाभियाँ ही गुम हैं...!

भीड़ में है
फिर भी अकेली है...
सुलझती ही नहीं
ज़िन्दगी पहेली है...


आँखों में बसा इंतज़ार
छलकता रहता है...
ताले की अपनी मज़बूरी है
उदास लटकता रहता है...


चाभियाँ ही गुम हैं...!



2 टिप्पणियाँ:

Ashok Saluja 12 अप्रैल 2015 को 7:37 am  

बहुत सुंदर ....चित्रण ...इंतज़ार और मज़बूरी का ......

Ankur Jain 12 अप्रैल 2015 को 7:51 am  

बहुत खूब..बड़ी किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति होती है..जब घर सामने हो, सुकून की तलाश हो पर ताला लगा हो और चाबियां गुम हों।

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ