अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

खुशियों की साझी धूप...!

हम दोनों
एक दूसरे की
ख़ुशी चाहते हैं...


हम दोनों एक जैसे हैं...



हम दोनों
एक दूसरे के
कष्ट से रोते हैं...



हम दोनों की ही
आँख में
आंसू हैं...



हम दोनों
एक दूसरे की आवाज़ सुनने तो
तरसते हैं...



फिर जाने क्यूँ हम बात नहीं करते...



हम दोनों
एक दूसरे की
ख़ुशी चाहते हैं


और
ये नहीं जानते...
(जानते हैं तो मानना नहीं चाहते)
कि ख़ुश तभी रहेंगे हम
जब हममें बात होगी


बिना किसी हिचक के
सामान्य रूप से
आत्मीयता की गूँज साथ होगी



और होगी...
जब जी चाहे तब
एक दूसरे की आवाज़ तक पहुँचने की सहूलियत
और कही गयी कहलवाई गयी
ढ़ेर सारी कविता...
खुशियों की साझी धूप वही
वही होगी जीवन गीता...!

4 टिप्पणियाँ:

Ashok Saluja 17 अप्रैल 2015 को 7:53 am  

हम हैं ...जो साँझा चुल्हा चाहते हैं ?
शुभकामनायें|

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 17 अप्रैल 2015 को 6:04 pm  

आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (18-04-2015) को "कुछ फर्ज निभाना बाकी है" (चर्चा - 1949) पर भी होगी!
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) 18 अप्रैल 2015 को 10:44 am  

सुंदर अभिव्यक्ति

रचना दीक्षित 18 अप्रैल 2015 को 6:07 pm  

खूबसूरत अभिव्यक्ति

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ