अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यादें कुछ... कुछ दुआएं!

कैसे कैसे तो... कहाँ कहाँ से हो कर गुजरता है जीवन... कितनी ही यादें हैं... कितना कुछ जी चुके हैं हम... कितना बीत चुका है समय... और साथ में कितना तो बीत चुके हैं हम...! कोई कोई दिन होता है... मन वर्तमान से अवकाश ले जाने कहाँ कहाँ विचरता है... कहाँ कहाँ क्या क्या उकेरते फिरता है और जिन्हें याद कर रहा होता है... चाहता है कहीं न कहीं मन... कि अपनी व्यस्त दुनिया के उस कोने पर वो भी हमें याद कर रहा हो... कभी कभार ही... यूँ ही... गलती से ही सही!

अगले सप्ताह मेरे इम्तहान हैं... कितना कुछ देखना समझना है उससे पूर्व... और हम हैं कि कितना कुछ बिखराए हुए... क्या क्या सोचते हुए... समय के जाने किस सिरे में खुद को खोने में व्यस्त हैं... कुछ जरूरी ई मेल्स के जवाब लिखने हैं... स्वीडिश में लिखना है... इसलिए अलसाये हुए टाले रहे... अभी उन्हीं का जवाब देते हुए... कुछ पुराने मेल्स पर नज़र पड़ी... कुछ ड्राफ्ट्स भी मिले... फिर जाने क्यूँ ये अनुशील का पन्ना खोले हम लिखने लगे... विचरने लगे विचारों और यादों के उस संसार में जहां दुआओं सा मिला था वो हमें...!

कितना परेशान रहा करते थे... हॉस्टल नहीं मिलने की वजह से कैंपस के बाहर रहना सच अत्यंत मुश्किल था... बी एच यू कैंपस की बात और है... वहाँ से बाहर की दुनिया कुछ और ही है... खैर, जो था अब अच्छा ही लगता है सोच कर... अनुभव ही तो था न... अस्सी के किनारे रहने का अपना ही सौभाग्य था...! रहते थे बाहर... पर पूरा समय तो कैंपस में ही बीतता था... दोस्त यहीं थे सब... किताबें यहीं थी... सबकुछ तो कैंपस में ही था...! बॉटनी डिपार्टमेंट, लाइब्रेरी, विश्वनाथ मंदिर, त्रिवेणी हॉस्टल... यहीं सब जगह दिन भर भटकते हुए रात को घर जाया करते थे... वो भी क्या समय था...! खैर... लिखना तो कुछ और है... लाइब्रेरी में बहुत वक़्त गुजरता था... एक ही सीढ़ी पर शीश नवाते हुए कितने ही लोगों से पहचान हुई... कितने अभिन्न हो गए सब समय के साथ... और आज समय के साथ कितने दूर भी...!

आशीष, आपको याद होगा... आप उतना नहीं आते थे... पर गौतम और ईश्वर हमेशा होते थे... उनका बस नज़रों के आसपास होना आश्वस्त कर जाता था... लगता था जैसे कोई समस्या होगी तो दीदी उनसे कह पाएगी और वो मुस्कुराते हुए दीदी की समस्या का समाधान भी कर देंगे... कभी बात नहीं होती थी... कब नमस्ते करते करते पाँव छूने लगे आपलोग... ये भी अब याद नहीं... सच! बिना किसी बातचीत के बस एक अभिवादन से जुड़ा वो कितना स्नेहिल रिश्ता था... है... और हमेशा रहेगा! गौतम को जाना... उसके कारण ही ईश्वर से पहचान हुई और फिर आपको भी जाना... ! पता नहीं गौतम चंद्रा जी और ईश्वर स्वरुप सहाय जी को हम याद हो भी अब या नहीं... पर उन्हें धन्यवाद करने का मन है... उन्हीं की वजह से आपसे हुई पहचान और देखिये आपसे कभी संपर्क टूटा नहीं...! उन दिनों की यादों में आपलोगों का विशेष स्थान है... और हमेशा रहेगा... ये देख कर ये सुन कर कितना अच्छा लगता है कि आप सबने सपने पूरे किये... हमारे सपने... अपने सपने... अपने मात पिता के सपने... और आज हम सभी को गर्व है आप सबों की उपलब्धियों पर...!
जाने क्यूँ हम ये सब लिख रहे हैं... बस लिख रहे हैं कि याद रह जाए अंकित इन पन्नों पर... कल को कुछ न भी हो तो यादें यहाँ होंगी... और दुआएं भी सदा आप लोगों के लिए...
कितनी ही कवितायेँ लिखीं थी लाइब्रेरी में बैठ कर... यूँ ही... कभी उदास हुए तब... कभी रोये तब... कभी परेशान हुए तब... और कभी जब आपलोगों से स्नेहिल हौसला मिला तब... अगर बातें पहुँचती हैं तो पहुंचे उन तक भी... दीदी ने सभी प्रेरणाओं और श्रेयों के लिए नम आँखों से धन्यवाद कहा है...

कभी हम सब फिर मिलें वैसे ही बी एच यू कैंपस में और उन पुराने दिनों को याद करें... २००४ से २००७ का वह वक़्त बहुत सुनहरा था... ये वही वक़्त था जब हमने अपने अपने सपनों की खातिर खूब मेहनत की और देखिये आज आप सभी सफल हैं... ढ़ेरों शुभकामनाएं हमेशा...!

काश कुछ तस्वीरें भी होतीं... पर यादों में तो हैं न उस वक़्त की कितनी ही तस्वीरें... सब को पुनः जिया... लिख नहीं पाए सब... बस जो एक प्रवाह में आता गया... बिखर गया यहाँ... ख़ुशी बस इतनी है कि ये शब्द पहुंचेंगे आप तक... और उन तक भी जो संपर्क में नहीं हैं अब...! यादों में सब वैसे ही हैं... यथावत... अभिन्न... बिलकुल अपने... उन सभी किताबों की तरह जो अपनी नहीं थीं... पर अपनी ही लगती थीं... सभी किताबें वैसी ही होंगी... बस हम उन्हें छोड़ आगे निकल आये हैं... जीवन ने हमें बहुत दूर ला रखा है... पर लौटेंगे...
और लौट कर एक बार फिर अवश्य आयेंगे...! अब तो सुशील जी भी साथ हैं और ये कितना सुन्दर को-इन्सिडेन्स है कि ये भी यहीं से हैं... इसी विश्वविद्यालय से... दोनों पुनः जायेंगे कभी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और साथ घूम कर उन सभी स्थानों को देखेंगे जिसे कभी अलग अलग जिया होगा हमने...!


Returning back to the Alma mater and reliving memories will certainly be very rewarding... !


2 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 22 अप्रैल 2015 को 7:26 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (23-04-2015) को "विश्व पृथ्वी दिवस" (चर्चा अंक-1954) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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विश्व पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

rafat alam 25 मई 2015 को 5:31 pm  

यादें कडवी,यादें मीठी होती हैं पर आपकी यादें दिली मुहब्बतों की हैं जो न हंसाती हैं न रुलाती है बस अपने भीतर रह कर सकूंन देती है.यादें बांटने के लिए शुक्रिया

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