अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

स्वतः सवेरा खिल आता है...!

व्यक्त होते होते
कितना कुछ है जो
रह जाता है,
अनकहा कितना कुछ
अनायास ही
आँखों से बह जाता है...



हर सुबह उग आता है
सम्पूर्ण लालिमा के साथ
इठलाता सूरज,
रात्रि संग उसका
सदियों पुराना
दूर का कोई नाता है...


अँधेरे और किरण का
रिश्ता भी कितना
निराला है,
एक दूसरे के पूरक दोनों
बस बाहर से ही
विरोधाभास नज़र आता है... 


अँधेरे अपनी चरमसीमा
लांघ कर प्रकाश का ही
प्रतिविम्ब हो जाते हैं,
रात्रि के सबसे अँधेरे
पहर के बाद ही तो
स्वतः सवेरा खिल आता है... 



व्यक्त होते होते
कितना कुछ है जो
रह जाता है,
अनकहा कितना कुछ
अनायास ही
आँखों से बह जाता है...! 

5 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 18 अप्रैल 2015 को 1:10 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (19-04-2015) को "अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है" (चर्चा - 1950) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar 18 अप्रैल 2015 को 1:51 pm  

बहुत सुन्दर

शारदा अरोरा 19 अप्रैल 2015 को 8:18 am  

beautiful..

सदा 19 अप्रैल 2015 को 11:13 am  

बेहतरीन प्रस्‍तुति

dj 19 अप्रैल 2015 को 1:44 pm  

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति अनुपमा जी

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ