अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जब खो जाते हैं शब्द...!

जब
खो जाते हैं शब्द...
तब भी
चलता ही है जीवन... 


जो कभी
टूट भी जाए
संवादों का पुल...
तब भी
जुड़े ही रहते हैं
जो जुड़े हुए थे मन...


कि...


यही जुड़ाव
बनाये रखता है
सांसों का तारतम्य 


और... 


उठते गिरते
चलते रहते हैं हम 


चलता रहता है जीवन! 

5 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi 7 अप्रैल 2015 को 3:41 am  

रे मन चल उदयन की ठौर

bhawna g 7 अप्रैल 2015 को 6:25 am  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 7 अप्रैल 2015 को 1:01 pm  

हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (08-04-2015) को "सहमा हुआ समाज" { चर्चा - 1941 } पर भी होगी!
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Pallavi saxena 8 अप्रैल 2015 को 10:46 am  

चलता तो रहता है जीवन। किन्तु केवल जिंदा रहने का नाम ही जीवन नहीं होता। क्यूंकी ज़िंदगी जीने का नाम है काटने का नहीं।

Pallavi saxena 8 अप्रैल 2015 को 10:46 am  

चलता तो रहता है जीवन। किन्तु केवल जिंदा रहने का नाम ही जीवन नहीं होता। क्यूंकी ज़िंदगी जीने का नाम है काटने का नहीं।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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