अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

स्नेह भरी छाँव...!

मैं बुनती हूँ सपने
सब तेरी ही आँखों के नूर से...
हर रंग तेरे चेहरे का
दिख जाता है मुझे
भले देखूं कितनी ही दूर से...!!


अब ये तमन्ना है-
फासले शून्य हो जायें
और निकटता मूर्त रूप में उपस्थित हो,
ये दुर्गम राहें रौशन हो...
अब तेरे मेरे नूर से...!!



जीवन के सफ़र में अब
संग संग ही चलना हो...
प्रेम पगी हो डगर
और तेरी स्नेह भरी छाँव में ही
मेरा गिरना और संभलना हो...!!

5 टिप्पणियाँ:

Sound of Silence 28 अप्रैल 2015 को 4:34 pm  

बहुत सुन्दर ...

rafat alam 29 अप्रैल 2015 को 7:05 am  

अब ये तमन्ना है-
फासले शून्य हो जायें....tu hai so main hoon faslaa kahaan hai...

dj 29 अप्रैल 2015 को 1:37 pm  

भावभीनी सुंदर अभिव्यक्ति

सदा 30 अप्रैल 2015 को 2:31 am  

मैं बुनती हूँ सपने
सब तेरी ही आँखों के नूर से...
हर रंग तेरे चेहरे का
दिख जाता है मुझे
भले देखूं कितनी ही दूर से...!!
bht hi badhiya bhavmay karte shabd

Anita 30 अप्रैल 2015 को 10:59 am  

बहुत कोमल भावनाओं से पिरोई कविता..

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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