अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दीप, तुम्हारे संघर्ष के कितने वितान... !!

तम के प्रभाव में
दीये का वज़ूद... 


बाती जल रही है फिर भी वहां
कैसे ये अँधेरे मौज़ूद... ??


ऐसे कितने ही
द्वन्द से
जूझते हैं मन प्राण... 


दीप!
तुम्हारे संघर्ष के
कितने वितान... !!


लौ की आस को
धारण किये रखना...
कितना कठिन होता होगा
उजाले की राह तकना...


सब पुरुषार्थ
अपनी नन्ही काया और
द्विगुणित माया से
सहज ही कर जाते हो...


दीप!
तुम मन के अँधेरे कोनों में
अपनी निश्छलता से
किरणें भर जाते हो... 


छोटा सा जीवन
और बड़े बड़े  इम्तहान...
दीप! तुम अपनी लघुता में ही
हर वृहद् सन्दर्भ से महान... !!






5 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 9 नवंबर 2015 को 8:22 am  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (10.11.2015) को "दीपों का त्योंहार "(चर्चा अंक-2156) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

रश्मि प्रभा... 9 नवंबर 2015 को 9:04 am  

लघुता की विशालता

ब्लॉग बुलेटिन 9 नवंबर 2015 को 11:18 am  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, तीन साधू - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kavita Rawat 9 नवंबर 2015 को 1:00 pm  

दीप पर्व पर सुन्दर रचना ..
दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें!

Asha Joglekar 10 नवंबर 2015 को 2:14 am  

दीप के संघर्ष की सुंदर कविता।

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ